रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंनवमोऽध्यायः । २६३
पाल्यां द्व्यङ्गुलविस्तरश्च मसृणोऽतीवार्द्धचन्द्रोपमो
घर्षो द्वादशकाङ्गुलश्च तदयं खल्लो मतः सिद्धये ॥ ८१ ॥
अस्मिन्पञ्चपलः सूतो मर्दनीयो विशुद्धये ।
तत्तदौचित्ययोगेन खल्लेष्वन्येषु योजयेत् ॥ ८२ ॥
१० अङ्गुल ऊंची, १६ अङ्गुल लम्बो, १० अंगुल चौड़ो और ७ अङ्गुल गहरी तथा किनारों की बनावट दो अङ्गुल चौड़ी और अर्ध चन्द्र के आकार की चिकनी खरल बनवावे तथा उसकी घर्षणी (मूसली) १२ अङ्गुल की बनवाना चाहिए। इस खरल को अर्धचन्द्र खरल कहते हैं। यह खरल रसादिकों की सिद्धि के लिये उत्तम है। इस खरल में शुद्धि के लिये ५ पल (२० तो०) पारद डालकर घोटना चाहिए। इसी तरह पारद की मात्रा के अनुसार छोटे या बड़े खरल बनवा कर उनमें योग्य मात्रानुसार पारद घोटना चाहिए ॥ ८१-८२ ॥
वर्तुलखलनिर्देशः ।
द्वादशाङ्गुलविस्तारः खल्लोऽतिमसृणोपलः ।
चतुरङ्गुलनिम्नश्च मध्येऽतिमसृणीकृतः ॥ ८३ ॥
मर्दकश्चिपिटोऽधस्तात्सुग्राह्यश्च शिखोपरि ।
अयं तु वर्तुलः खल्लो मर्दनेऽतिसुखप्रदः ॥ ८४ ॥
१२ अंगुल लम्बी और चौड़ी तथा ४ अंगुल गहरी, अत्यन्त चिकने पत्थर की और विशेष कर बीच के भाग में अत्यन्त चिकनी खरल बनवानी चाहिए तथा उसकी घर्षणी (मूसली) नीचे से चिपटी और ऊपर के भाग में उत्तम प्रकार से पकड़ने योग्य होनी चाहिए। इस को वर्तुलखल्ल कहते हैं। रसादिकों के घोटने में यह अत्यन्त उत्तम है ॥ ८३-८४ ॥
अथ तप्तखलप्रमाणनिर्देशः—
लौहो नवाङ्गुलः खल्लो निम्नत्वे च षडङ्गुलः ।
मर्दकोऽष्टाङ्गुलश्चैव तप्तखल्लाभिधोऽप्ययम् ॥ ८५ ॥
९ अङ्गुल लम्बी चौड़ी, ६ अङ्गुल गहरी लोहे की खरल और उसकी घर्षणी ८ अङ्गुल की बनवानी चाहिए। इसको तप्तखल्ल कहते हैं ॥ ८५ ॥
अथ तप्तखलविधिः—
कृत्वा खल्लाकृतिं चुल्ली मङ्गारैः परिपूरिताम् ।