रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
पृष्ठ 354, कुल 362 में से
संदर्भ में पढ़ें२६४ | रसरत्नसमुच्चये-
तस्यां निवेश्य तं खल्लं पार्श्वे भस्त्रिकया धमेत् ॥ ८६ ॥
तदन्तर्मर्दिता पिष्टिः क्षारैरम्लैश्च संयुता ।
प्रद्रवत्यतिवेगेन स्वेदिता नात्र संशयः ॥
कृतः कान्तायसा सोऽयं भवेत्कोटिगुणो रसः ॥ ८७ ॥
इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तस्य सूनोर्वाग्भट्टाचार्यस्य कृतौ रसरत्नसमुच्चये
यन्त्रनिरूपणं नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥
जिस आकार की लोहे की खरल बनी हो वैसा ही चूल्हा (भट्टी) बनवा कर अङ्गारों (जलतेकोयलों) से भर देना चाहिए। फिर उस चूल्हे पर खरल को रख कर चूल्हे की अग्नि को पार्श्व से धौंकनी द्वारा प्रदीप्त करनी चाहिए। पश्चात् उस खरल में ओषधियों के साथ घोंटी हुई पारद की पिष्ठी डालकर क्षार तथा अम्ल पदार्थों के साथ खूब घोटते रहना चाहिए। इस तरह स्वेदन करने से पारद की पिष्ठी द्रवीभूत हो जाती है। यदि यह तप्त खरल साधारण लोह की न बनवा कर यदि कान्त लोह की बनवाई जाय तो उस में सिद्ध किया हुआ पारद करोड़ गुना अधिक फलप्रद हो जाता है ॥ ८६-८७ ॥
इति श्रीकृष्णआत्मजेन पण्डितप्रवरेण श्रीअम्बिकादत्तशास्त्रिणा कृतायां रसरत्नसमुच्चयस्य रत्नोज्ज्वलाख्यभाषाटीकायां यन्त्रनिरूपणं नाम नवमोऽध्यायः ॥ ९॥
दशमोऽध्यायः ।
अथ मूषादिकथनम्—
अथ मूषायाः पर्यायाः—
मूषा हि क्रौञ्चिका प्रोक्ता कुमुदी करहाटिका ।
पाचनी वह्निमित्रा च रसवादिभिरीयते ॥ १ ॥
रसशास्त्र के व्याख्याताओं ने मूषा के क्रौञ्चिका, कुमुदी, करहाटिका, पाचनी और वह्निमित्रा ये इतने पर्याय शब्द (एकार्थ वाचक) कहे हैं ॥ १ ॥
अथ मूषाया निरुक्तिः ।
मुष्णाति दोषान्मूषा या सा मूषेति निगद्यते ॥ २ ॥