रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
DevanagariHindipublished362 पृष्ठ
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| विषयाः | पृष्ठाङ्काः | विषयाः | पृष्ठाङ्काः |
|---|---|---|---|
| चूर्णाञ्जनम् | ८२४ | पित्ताभिष्यन्दे तीक्ष्णादिवर्तिः | ८३७ |
| मसीयोगः | ” | पित्ताभिष्यन्दे नागादिवर्तिः | ” |
| तिलजदीपाञ्जनम् | ८२५ | ताम्रादिवर्तिः | ” |
| चण्डभैरवरसः | ” | पारदादिवर्तिः | ८३८ |
| पर्पटीरसप्रयोगविधिः | ८२६ | एकत्रिशाङ्गवर्तिः | ” |
| पर्पटीरसस्य प्रकारान्तरेण सेवनोपदेशः | ” | षडङ्गवर्तिः | ८३९ |
| नेत्ररोगाणां संख्या | ” | द्वादशाङ्गवर्तिः | ” |
| नेत्ररोग-चिकित्सा | ८२७ | पटलहरेन्द्ररसः | ८४० |
| ताम्रवर्तिः | ” | खर्णादिवर्तिः | ” |
| ताम्रद्रुतिः | ” | विशायाञ्जनम् | ” |
| ताम्रद्रुतिः | ” | पुष्पहराञ्जनम् | ८४१ |
| ताम्रद्रुतिः | ८२९ | शिग्रुमूलाद्याश्च्योतनम् | ” |
| गन्धकद्रुतिः | ८३० | नेत्रशूलघ्नमाश्च्योतनम् | ” |
| गरुडाञ्जनम् | ८३१ | पौनर्नवाञ्जनम् | ” |
| तिमिरहराञ्जनम् | ८३२ | नेत्रजलस्रावहरोयोगः | ” |
| पटलहराञ्जनम् | ” | वक्ररोमहराञ्जनञ्च | ” |
| रक्ताञ्जनम् | ८३३ | नृकपालाञ्जनम् | ८४२ |
| शम्बूकादिवर्तिः | ” | काचान्धह्राञ्जनम् | ” |
| नक्तान्ध्ये पञ्चाङ्गगुटिका | ” | राज्यन्धहराञ्जनम् | ” |
| नवनेत्रदात्रीवर्तिः | ८३४ | अभिष्यन्दहरो योगः | ८४३ |
| नयनरोगहरा वर्तिः | ” | राज्यन्धे व्योषाञ्जनम् | ” |
| शिग्रुतैलम् | ८३५ | राज्यन्धे मरिचाञ्जनम् | ” |
| नागादिवर्तिः | ” | तिमिरहराञ्जनम् | ” |
| वाताभिष्यन्दे इन्द्रादिवर्तिः | ” | चतुर्विंशोऽध्यायः । | ८४५ |
| श्लेष्माभिष्यन्दे शुल्वादिवर्तिः | ८३६ | कर्णरोगः | ” |
| त्रिदोषाभिष्यन्दे रसेन्द्रवर्तिः | ” | कर्णरोगनामानि | ” |
| कर्णरोगचिकित्सा | ८४६ |