रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमोऽध्यायः । ३
रसतन्त्र का सङ्ग्रह करने वाला स्वच्छ, रसेन्द्रतिलक, योगी, भालुकी, मैथिल, महादेव, नरेन्द्र, वासुदेव, हरिश्वर, इनके और अन्य आचार्यों के रसतन्त्र शास्त्रों को देख कर चिकित्सा में अत्यन्त उपयुक्त सिद्धरसों का इस 'रसरत्नसमुच्चय' नामक ग्रन्थ में सिंहगुप्त का पुत्र मैं वाग्भट स्वयं सङ्ग्रह करता हूं । इस ग्रन्थ में रस और उपरस तथा सप्तलौह या सप्तधातु तथा इनकी शुद्धि के लिये दोला यन्त्रादि उपकरण तन्त्र तथा इनके शोधन, सत्त्वपातन, द्रुतिकरण और भस्म करने की भिन्न २ विधियों का वर्णन भी किया जायगा ॥ २–९ ॥
अथ हिमालयवर्णनम्—
अस्ति नीहारनिलयो महानुत्तरदिङ्मुखे ।
उत्तूङ्गशृङ्गसङ्घातलङ्घिताभ्रो महीधरः ॥ १० ॥
विश्रामाय वियन्मार्गविलङ्घनघनश्रमः ।
अवतीर्ण इव क्षोणीं शरदम्बुमुचां गणः ॥ ११ ॥
राशीराशीविषाधीशफणाफलकरोचिषाम् ।
भित्त्वा भुवमिवोत्तीर्णो यो विभाति भृशोन्नतः ॥ १२ ॥
ज्वलदोषधयो यस्य नितम्बमणिभूमयः ।
नक्तमुद्दामतडितामनुकुर्वन्ति वार्मुचाम् ॥ १३ ॥
कटके सञ्चरन्तीनां यस्य किन्नरयोषिताम् ।
पादेषु धातुरागेण लाक्षाकृत्यमनुष्ठितम् ॥ १४ ॥
अवतंसितशीतांशुराच्छादितदिगम्बरः ।
यो गुहाधिगतो लोकैर्गिरीश इति गीयते ॥ १५ ॥
उत्तर दिशा में स्थित, हिम का प्रधान स्थान, ऊंचे २ शिखरों के समूह से मेघों को भी अतिक्रमण करने वाला, दिनरात आकाश मार्ग में चलने से उत्पन्न हुए श्रम के निवारणार्थ भूपृष्ठ पर उतरा हुआ मानों शरद् ऋतु के मेघों के समूह के समान शोभायमान, और पृथ्वी को विदीर्ण करके निकले हुए शेष नाग के सहस्रफणों में स्थित मणियों की किरणों के समूह के सदृश श्वेतकान्ति वाला अत्यन्त उन्नत हिमालयपर्वत शोभायमान हो रहा है, और दिव्य औषधियों वाले जिस हिमालय के मध्य भाग का मणिजडित प्रदेश ( भूमियां ) रात्रि में अत्यन्त चमकती हुई विद्युत् से युक्त मेघों का अनुकरण करते हैं । और जिस हिमालय के