भारतकोश
रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

DevanagariHindipublished362 पृष्ठ

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रसरत्नसमुच्चये—

मध्य भाग में भ्रमण करती हुई किन्नर स्त्रियों के चरणों में लगी हुई पद्मरागादि मनःशिला और गैरिक आदि धातुओं की लालिमा ने अलक्तक के पादरञ्जनरूपी कार्य को सम्पादन किया है । और वहां शिवजी का स्थान होने से चन्द्रमा को अपना शिरोभूषण बनाकर, तथा दिशारूपी वस्त्रों को धारण किया हुआ (अर्थात् समग्रदिशाओं में व्याप्त) और नाना कन्दराओं से युक्त (अथवा अपने दौहित्र कार्तिकेय का अधिष्ठान है जिसमें) ऐसा यह हिमालय सर्व पर्वतों का स्वामी जनों से पुकारा जाता है ॥ १०—१५ ॥

अथ महादेवस्थितिवर्णनम्— निमीलितदृशो नित्यं मुनयो यस्य सानुषु । प्रत्यक्षयन्ति गिरिशमवाङ्मनसगोचरम् ॥ १६ ॥ शिलातलप्रतिहतैर्यस्य निर्झरशीकरैः । अहन्यपि निरीक्षन्ते यक्षास्ताराङ्कितं नभः ॥ १७ ॥ नीहारपवनोद्रेकनिःसहा यत्र पूरुषाः । निजस्त्रीणां निषेवन्ते कुचोष्माणं निरन्तरम् ॥ १८ ॥ सञ्चरन्कटके यस्य निदाघेऽपि दिवाकरः । उद्दामहिमरुद्धोष्मा न शीतांशोर्विभिद्यते ॥ १९ ॥ गुहागृहेषु कस्तूरीमृगनाभिसुगन्धिषु । गायन्ति यत्र किन्नर्यो गौरीपरिणयोत्सवम् ॥ २० ॥ चकास्ति तत्र जगतामादिदेवो महेश्वरः । रसात्मना जगत्त्रातुं जातो यस्मान्महारसः ॥ २१ ॥

जिस हिमगिरि के शिखर प्रदेशों पर स्थित महर्षिगण ध्यान से नेत्रों को बन्द करके वाणी और चित्त से भी अवर्णनीय ऐसे महादेव का नित्य ही ज्ञान चक्षुओं से प्रत्यक्ष दर्शन प्राप्त करते हैं। और जिस पर्वत पर रहने वाले यक्षगण दिन में भी शिलापृष्ठ पर ताड़ित हुए झरनों के छोटे २ कणों से आकाश को नक्षत्रों से व्याप्त हुआ देखते हैं । और जहां पर निवास करने वाले पुरुष तुषार के कणों से मिश्रित वायु के वेग को सहन करने में असमर्थ होकर सर्वदा निज स्त्रियों के स्तनों की उष्णता को प्राप्त करते हैं। और जिस हिमालय के शृङ्ग पर ग्रीष्म ऋतु में सञ्चरण करने वाला सूर्य तुषार से उष्णता नष्ट होने के कारण चन्द्रमा से भिन्न-