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रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा

स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)

DevanagariHindipublished362 पृष्ठ

दशमोऽध्यायः।

दशमोऽध्यायः। २६९

समैः समा च मूषामृन्महिषीदुग्धमर्दिता ॥ १९ ॥
क्रोञ्चिका यन्त्रमात्रे हि बहुधा परिकीर्त्तिता ।
तया विरचिता मूषा लिप्ता मत्कुणशोणितैः ॥ २० ॥
बालाब्दध्वनिमूलैश्च वज्रद्रावणक्रौञ्चिका ।
सहतेऽग्निं चतुर्यामं द्रवेण व्याधिता सती ॥ २१ ॥

तालाब का चिकना गारा १ भाग, केंचुओं का सत्त्व १ भाग, तुषों (भूसे) की राख १ भाग, कूटा हुआ सन १ भाग तथा इन सबके बराबर मूषा के लायक काली या नीली मिट्टी लेकर सब को एकत्रित कूट कर भैंस के दुग्ध में घोटें। फिर जिस प्रकार की आकृति (स्वरूप) वाले यन्त्र में रखना हो उस स्वरूप की मूषा बनाकर उसको खट्मल (मत्कुण) के रक्त से लिप्त कर सुखा लेवें। फिर उस को नवीन (हरे) कांटेदार चौलाई की जड़ के स्वरस या काथ से अथवा सुगन्धवाला, नागरमोथा, अमरवेल (आकाशलता) के काढ़े से लिप्त कर सुखा लेनी चाहिए। फिर इसको द्रवपदार्थों से भरकर हीरा इत्यादि कठोर पदार्थों का इस में द्रव करते हैं। यह मूषा ४ प्रहर तक अग्नि को सहन कर सकती है। इस को वज्रद्रावणक्रौञ्चिकामूषा कहते हैं ॥ १९-२१ ॥

अथ मूषाऽऽप्यायनम्—

द्रवे द्रवीभावमुखे मूषाया ध्मानयोगतः ।
क्षणमुद्धरणं यत्तन्मूषाऽऽप्यायनमुच्यते ॥ २२ ॥

मूषायंत्र में रखे हुए द्रवण होने योग्य लोह, रत्न आदि पदार्थ अग्निके संयोग से फूंकने से जब द्रवित होने लगते हैं, उस समय उनको क्षण भर स्थायी करने के लिये चूल्हे पर से उतार लेते हैं। इस क्रिया को मूषाऽऽप्यायन कहते हैं ॥२२॥

अथ वृन्ताकमूषा—

वृन्ताकाकारमूषायां नालं द्वादशकाङ्गुलम् ।
धत्तूरपुष्पवच्चोर्ध्वं सुदृढं श्लिष्टपुष्पवत् ॥ २३ ॥
अष्टाङ्गुलञ्च सच्छिद्रं सा स्याद्वृन्ताकमूषिका ।
अनया खर्परादीनां मृदूनां सत्त्वमाहरेत् ॥ २४ ॥

बैगन (वृन्ताक या भण्टा) के समान आकार की मूषा बनाकर उसमें धत्तूरे के पुष्प के समान और दोनों प्रान्तभागों में छिद्रयुक्त ८ अङ्गुल की एक नलिका

२७० रसरत्नसमुच्चये—

जिस तरह पुष्प डण्ठल के साथ अच्छी तरह लगा रहता है उसी तरह अच्छी तरह से लगा देनी चाहिए। इसको वृन्ताकमूषा कहते हैं। इसके द्वारा कोमल खर्पर जैसे पदार्थों का सत्त्व निकाला जाता है ॥ २३-२४ ॥

अथ गोस्तनीमूषा— मूषा या गोस्तनाकारा शिखायुक्तपिधानका । सत्त्वानां द्रावणे शुद्धौ मूषा सा गोस्तनी भवेत् ॥ २५ ॥

जिस मूषा की आकृति (बनावट) गाय के स्तन के समान हो और उसका ढक्कन शिखा के समान नीचे से मोटा और ऊपर से पतला हो ऐसी मूषा को गोस्तनीमूषा कहते हैं। यह मूषा सत्त्वों के द्रवण करने और उनको शोधन करने के लिए उत्तम होती है ॥ २५ ॥

अथ मल्लमूषा— निर्दिष्टा मल्लमूषा या मल्लद्वितयसम्पुटात् । पर्पट्यादिरसादीनां स्वेदनाय प्रकीर्तिता ॥ २६ ॥

दो मिट्टी के सकोरों को परस्पर जोड कर कपड़मिट्टी से दोनों के मुख की सन्धि को बन्द कर देते हैं। इसको मल्लमूषा कहते हैं। यह मूषा पर्पटी तथा अन्य रसों के स्वेदन करने के लिये बनाई जाती है ॥ २६ ॥

अथ पक्वमूषा— कुलालभाण्डरूपा या दृढा च परिपाचिता । पक्वमूषेति सा प्रोक्ता पोट्टल्यादि विपाचने ॥ २७ ॥

कुम्हार के बनाये हुए भाण्ड (या उसके घट के लिये बनाये हुये भिन्न २ कपाल के) के समान आकृति की दृढ मूषा बना कर उसको अग्नि में पका लेनी चाहिए। इस को पक्वमूषा कहते हैं। यह मूषा हिरण्यगर्भ या रसगर्भ पोट्टली आदि के पकाने में काम आती है ॥ २७ ॥

अथ गोलमूषा— निर्वक्रगोलकाकारा पुटनद्रव्यगर्भिणी । गोलमूषेति सा प्रोक्ता सत्त्वरद्रवरोधिनी ॥ २८ ॥

मल्लमूषा के समान मूषा के दो गोल भाग पृथक् २ बनाकर उन में से एक में पुट देने योग्य पदार्थों को भर कर दोनों को परस्पर जोड़कर अच्छी तरह (मुख

दशमोऽध्यायः । २७१

पर छिद्र न रह जाय) बन्द करके कपड़मिट्टी कर देनी चाहिए । इसको गोलमूषा कहते हैं । यह मूषा अग्नि में उड़ने लायक द्रव हुए पदार्थों को बाहर नहीं उड़ने देती है । अथवा द्रव्यों को शीघ्र ही निर्मल कर देती ॥ २८ ॥

अथ महामूषा—

तले या कूर्पराकारा क्रमादुपरि विस्तृता ।
स्थूलवृन्ताकवत्स्थूला महामूषेत्यसौ स्मृता ।
सा चायोऽभ्रकसत्त्वादेः पुटाय द्रावणाय च ॥ २९ ॥

जो मूषा तल भाग में कूर्परसन्धि ( एल्बो ज्वाइण्ट ) के समान पतली हो तथा क्रम से ऊपर को विस्तृत ( चौड़ी ) होती जाय और बैंगन के समान मोटी ( प्राय मध्य भाग में ) हो उसको महामूषा कहते हैं। यह मूषा लोह, अभ्रक, इत्यादि धातुओं के सत्त्व को पिघलाने तथा पुट देने के लिये उत्तम होती है ॥२९॥

अथ मण्डूकमूषा—

मण्डूकाकारमूषा या निम्नताऽऽयामविस्तरा ।
षडङ्‌गुलप्रमाणे मूषा मण्डूकसंज्ञिका ।
भूमौ निखन्य तां मूषां दद्यात्पुटमथोपरि ॥ ३० ॥

जो मूषा मेंढक के आकार के समान बीच में चौड़ी और दोनों भागों पर पतली हो तथा जिसकी लम्बाई और चौड़ाई ६ अंगुल हो ऐसी मूषा को मण्डूक मूषा कहते हैं। इस मूषा के अन्दर द्रव्य भर कर पृथ्वी में एक बिलस्त गहरी इसको गाड़ करके उसके ऊपर उपलों से पुट देवे ॥ ३० ॥

अथ मुसलाख्यमूषा—

मूषा या चिपिटा मूले वर्तुलाऽष्टाङ्गुलोच्छ्रया ।
मूषा सा मुसलाख्या स्याच्चक्रिवद्धरसे हिता ॥ ३१ ॥

जो मूषा तल भाग में चपटी तथा ऊपर की ओर गोल स्वरूपवाली तथा ८ अंगुल ऊंची हो उसको मूसलाख्यमूषा कहते हैं। यह मूषा आगे स्त्री रोगाधिकार में कथित चक्रिबद्व रस के बनाने में हितकर होती है ॥ ३१ ॥

अथ कोष्ठिकानिर्देशः—

सत्त्वानां पातनार्थाय पातितानां विशुद्धये ।
कोष्ठिका विविधाकारास्तासां लक्षणमुच्यते ॥ ३२ ॥

२७२रसरत्नसमुच्चये—

लोह, अभ्रक, रत्न आदि अनेक पदार्थों के सत्त्वों को निकालने के लिये तथा निकले हुए सत्त्वों की शुद्धि करने के लिये अनेक स्वरूप की कोष्ठिकाएं शास्त्र में कही गई हैं, उनके लक्षण नीचे लिखे जाते हैं ॥ ३२ ॥

अथ अङ्गारकोष्ठी—

राजहस्तसमुत्सेधो तदर्द्धायामविस्तरा ।
चतुरस्रा च कुड्येन वेष्टिता मृण्मयेन च ॥ ३३ ॥
एकभित्तौ चरेद्द्वारं वितस्त्याभोगसंयुतम् ।
द्वारं सार्धवितस्त्या च सम्मितं सुदृढं शुभम् ॥ ३४ ॥
देहल्‍यधो विधातव्यं धमनाय यथोचितम् ।
प्रादेशप्रमिता भित्तिरुत्तरङ्गस्य चोर्ध्वतः ॥ ३५ ॥
द्वारं चोपरि कर्त्तव्यं प्रादेशप्रमितं खलु ।
ततश्चेष्टिकया रुद्ध्वा द्वारसंधिं विलिप्य च ॥ ३६ ॥
शिखित्रैस्तां समापूर्य्य धमेद्भस्त्राद्वयेन च ।
शिखित्रान् धमनद्रव्यमूर्ध्वद्वारेण निक्षिपेत् ॥ ३७ ॥
सत्त्वपातनगोलांश्च पञ्च पञ्च पुनः पुनः ।
भवेदङ्गारकोष्ठीयं खराणां सत्त्वपातिनी ॥ ३८ ॥

राजहस्त (साधारण मनुष्य के हस्त से सवाया हस्त राजहस्त मानना चाहिए, प्रायः साधारण मनुष्य का हस्त २४ अङ्गुल लम्बा होता है और राजहस्त तीस अङ्गुल लम्बा माना जाता है, राजहस्त ही को प्रायः गजहस्त कहते हैं) के समान ऊंची और उसकी आधी अर्थात् पन्द्रह अङ्गुल चौड़ो तथा चार मिट्टी की भित्तियों से युक्त एक चोकोर कोष्ठी बनाकर उसकी एक भित्ति में बीच के भाग से कुछ ऊपरी भाग में एक बालिस्त (बेंत) या डेढ बालिस्त चौड़ा द्वार बनावें, तथा देहली के नीचे धौंकनी के द्वारा फूंकने के लिये उचित द्वार बनावे, फिर उस कोष्ठी के ऊपरी भाग में प्रादेश (१) के समान मोटी भित्ति की छत बनाकर प्रादेश के समान चौड़ा एक द्वार छत में बनाकर ईंट से उसे ढककर सन्धिबन्धन कर देवे, फिर ऊपर के भाग में स्थित भित्ति के द्वार से कोयले तथा सत्त्वपातन


(१) अङ्गुष्ठ तथा तर्जनी अङ्गुली के मध्य के अवकाश को प्रादेश कहते हैं यथा—"अङ्गुष्ठस्य प्रदेशिन्या न्यासः प्रादेश उच्यते" ।