रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री) द्वारा
स्रोत: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (उद्गम)
तृतीयोऽध्यायः। १०५
तृतीयोऽध्यायः। १०५
जाता है । गन्धक गोदन्ती और चूने के साथ शिरा, मृत्तिका, राल का शकल का तथा रवों आदि के रूप में जमा पाया जाता है ।
गन्धक निम्न रूप में मिलता है ।
- ( १ ) रवेदार गन्धक ( Crystalline Forms )
- ( क ) अष्टफलकीय रवेदार गन्धक ( Octahedral sulphur )
- ( ख ) त्रिपाश्र्वीय रवेदार गन्धक ( Prismatic sulphur )
- ( २ ) बिना रवेदार गन्धक ( Amorphous forms )
- ( अ ) नम्य गन्धक ( Plastic sulphur )
- ( ब ) श्वेत रवे रहित ( White Amorphous )
- ( म ) पीत रवे रहित ( Yellow amorphous )
- ( ३ ) द्रवितगन्धक ( Colloidal sulphur )
गन्धक और गन्धकाय खनिज प्राप्ति के स्थान
अफगानिस्तान—
के हजार जाठ ( Hazara Jat ) नामक स्थान में प्राकृतिक गन्धक बहुतायत से प्राप्त होता है ।
पीत गन्धक के डले और शिरायें गोदन्ती के खण्डों के साथ “दस्त-ह-सफेद” ( Dast i-safed ) नामक स्थान के आस पास में मिलता है ।
आसाम—
के लखिमपुर जिले के “माकुम” ( Makum ) ग्राम में माक्षिक के खण्ड ( Shales ) भुगर्भज कोयले के साथ ऊपर आसाम में प्राप्त होते हैं । किन्तु इनकी मात्रा इतनी नहीं है कि जिससे गन्धक निकाल कर व्यापारिक लाभ उठाया जा सके ।
बलुचिस्तान ( Baluchistan )
के कोह-इ-सुलतान ( Koh-i-sultan ) नामक स्थान में प्रशान्त ज्वालामुखी के आस पास के परिवर्त्तित स्थानों में पीत गन्धक और गौदन्ती पाये जाते हैं । यहां के निवासी खनिज गन्धक को नांदो में भर कर गरम करते हैं। जब गन्धक पिघल जाता है तब उसे तसलों की शकल के ढांचों में ढाल कर अन्य पार्थिव अशुद्धियों से शुद्ध कर लिया करते हैं । “बोलन पास के “द्राज बेन्ट” ( Draj Bent ) और गोकुर्थ ( Gokurth ) नामक स्थानों में भी मृत्तिकाकृति चूने के साथ गन्धक पाया जाता है । किन्तु यहां से उसकी निकासी कठिन है ।
कच्छी ( Kachhi )
जिले के सन्नी ( Sanni ) नामक स्थान में गन्धक की बड़ी खान रही है । सन् १८४६ ई० हुटन ( Huttan ) नामक अंग्रेज ने इस स्थान को जाकर देखा था ।
१०६
रसरत्नसमुच्चये -
उसका कथन है कि इस स्थान में गंधक अष्ट पार्श्वीय रवों और चूर्ण के रूप में बहुतायत से प्राप्त हो सकता है। अब भी यहां के निवासी खनिज गंधक को निकाल कर 'सन्नी' के पूर्व की तरफ स्थित बाग ( Bagh ) नामक स्थान पर ले जाकर उसे तैल के साथ पिघाल कर शुद्ध किया करते हैं। बाग नामक स्थान सत्री से ४० मील दूर है। यहां पर की खान की खुदाई का काम अफगानिस्तान के अमीर के तरफ से होता रहा है पर अब ब्रिटिश सरकार के आधिपत्य में आ जाने पर गंधक की निकासी का काम बन्द कर दिया गया है। किसी कारण वश इस खान में आग लग जाने से खान का कुछ अंश जल भी गया है। सन् १९०६ ई० में इस खान को टिप्पर ( Tipper ) नामक अंग्रेज देखने गया था। उसका लिखना है कि इस स्थान में गन्धक शिवालिक मृत्तिका के साथ शिराओं के रूप में प्राप्त होता है। कुछ स्थान पर गन्धक इस प्रकार जमा हुआ है कि वह आसानी से जल सकता है। होलेन्ड ( Holland ) नामक विद्वान की राय है कि यहां गन्धकीय जमाव व्यापारिक लाभ उठाने के योग्य है।
लास वेला ( Las bela )
जिले में 'कान बेरार' ( Kan Berar ) नामक स्थान के आस पास खारे स्रोतों के समीप गन्धक का जमाव देखा गया है। यहां पर के स्रोतों के समीप रेणु शिला की शिराओं में लवण और गन्धक की शिरायें देखी जाती हैं। किन्तु परीक्षा करने से विदित हुआ कि यहां का जमाव व्यापारोपयोगी नहीं है।
मेकरन तट ( Mekran coast )
के जिले में करघारी ( Karghari ) के पास गोलकुर्ट ( Golkurt ) स्थान में बहुत गन्धक एकत्रित किया जा सकता है।
सिबि ( Sibi )।
जिले में "खाटान" (Khattan) नामक स्थान के मिट्टी के तैल के कूप के पास वाले उष्ण स्रोतों के स्राव से रवेदार गन्धक का बहुत सा जमाव पाया जाता है।
बैरन आइलेन्ड ( Barten Island )
में भी गन्धक का जमाव पाया जाता है। किन्तु उसकी मोटाई २ या ३ इञ्च से अधिक नहीं है और कई दर्जन टन से अधिक गन्धक निकालने का अनुमान भी नहीं किया जाता है।
विहार और उड़िसा—
मयूरभञ्ज रियासत के धल भूमि सीमा प्रान्त के मालाघाटी के पास में विशेष रूप से रौप्यमाक्षिक ( Iron pyrites ) अनेक स्थानों में पाया जाता है। आज कल गन्धक निकालने का यह प्रधान खनिज समझा जाता है।
सिन्ध भूम जिले में सुवर्ण माक्षिक ( Copper pyrites ) से ताम्र के साथ
तृतीयोऽध्यायः । १०७
तृतीयोऽध्यायः । १०७
गन्धक बहुतायत के साथ प्राप्त किया जा सकता है। यहां के ताम्र के खनिजों का व्यापार उसी दशा में लाभ कारक हो सकता है जब बड़े पैमानों पर काम किया जाय।
बम्बई—
सिन्ध के गिजरी बन्दर ( Ghizri bunder ) पर गन्धक के जमाव का पता लगाया गया है। यहां के खनिजों से ६० फी सदी गन्धक प्राप्त किया जा सकता है। किसी समय “लाकि” ( Laki ) नामक स्थान के स्रोतों के स्राव से जो गन्धक के जमाव “जामा” ( Scum ) के रूप में बनते थे, उनसे वहां के ग्राम्यजन गन्धक निकालने का अध्यवसाय करते थे । किन्तु व्यापारिक लाभ के लिये यहां की गन्धक पर्याप्त नहीं समझी जाती ।
बर्मा ( Burma )
सन् १८७३ में स्ट्रोवर ( Strover ) नामक विद्वान ने लिखा है कि वर्मा राजाओं के राज्य काल में अपर वर्मा में अनेक स्थानों से २८००० बिस ( एक बर्मा तौल ) गन्धक रौप्यमाक्षिक से उड़ा कर प्रति वर्ष निकाला जाता रहा है। बर्मा में गन्धक व्यवसाय का मुख्य केन्द्र जोन्स ( Jones ) के लेखानुसार “मासुन” ( Mowsun ) नामक प्रान्त के समीप में रहा है।
दक्षिणी शान राज्यों ( Southern Shan states ) में भी गन्धक निकालने का व्यवसाय अब तक होता रहा है। शान राज्यों की अनेक प्रकार की स्फटिक शिलाओं में रौप्यमाक्षिक पाया गया है। इस रौप्यमाक्षिक से गन्धक निकालने का कारोबार चल सकता है। यहां के रौप्यमाक्षिक में सुवर्ण, रजत आदि बहुमूल्य खनिज प्राप्त नहीं होते । ये स्थान इतने निकट हैं कि यहां पर रौप्यमाक्षिक से गन्ध-काम्ल बनाने का व्यवसाय लाभ पूर्वक नहीं चलाया जा सकता ।
दक्षिण हैदराबाद—
के गुलबर्ग ( Gulbarg ) जिले में मुदानूर ( Mudanur ) नामक स्थान पर आधिक्य से रौप्यमाक्षिक प्राप्त होता है, जिससे गन्धक निकालने का व्यवसाय किसी जमाने में होता रहा है।
कश्मीर—
के बाल्टिस्तान ( Baltistan ) जिले में अनेक उष्ण-स्रोतों से गन्धक का जमाव होता है। रूपशु ( Rupshu ) जिले की पुगा घाटी ( Puga valley ) के उष्ण-स्रोत-सम्बन्धी गन्धकीय जमाव से काश्मीर दरबार की तरफ से गन्धक निकालने का कारोबार हुआ करता था, यहां शीत अधिक होने के कारण केवल वर्ष में चार मास तक ही कारखाना चलता था, जिससे गन्धक की वार्षिक निकासी २०-२५ टन हो जाया करती थी।
१०८ रसरत्नसमुच्चये-
मद्रास- के आरकोट ( Arcot ) जिले में आधा मील तक गन्धक का जमाव 'वोलण्डर-पेट ( Wolunderpet ) से कुछेक मील की दूरी पर पोडिया बोलियं ( Wodia Paliam ) नामक जिले में स्थित है।
गोदावरी- के किनारे २ दलदलों के क्षेत्रों में पानी सूख जाने पर ढेलों के रूप में जमा हुआ गन्धक पाया जाता है। यहां के गन्धक के खनिजों में २८% फी सदी स्वतन्त्र गन्धक और ६८ फी सदी निश्चित रूप में गन्धक पाया जाता है।
ट्रावनकोर- राज्य में मङ्गामलाई ( Mangamalai ) नामक पहाड़ी पर कान्तमाक्षिक ( Pyrrhotite ) मिलता है इससे गन्धक निकाला जा सकता है। इसी स्थान के पश्चिमी भाग की ओर कुछ दूरी पर एक दूसरा जमाव भी कान्तमाक्षिक का है।
उत्तरी पश्चिमीय सीमाप्रान्त ( North West Frontier Province ) के कोहाट जिले में इन्डस ( Indus ) नदी के पश्चिमी किनारे पर माक्षिकीय ( Pyritous ) मिश्रित स्फटिक ( Alum ) के खपड़े सुधा पाषाण के नीचे जमे पाये जाते हैं। इन खपड़ों से गन्धक निकालने का व्यवसाय किया जाता रहा है। गन्धक निकालने के लिये डमरू यन्त्र का उपयोग किया जाता था। इस यन्त्र द्वारा गन्धक उड़ाकर गन्धक के फूल तय्यार किये जाते रहे हैं।
शिरानी ( Shirani ) नामक जिले में डोमुन्डा ( Domunda ) के पास में रौप्यमाक्षिक के परिवर्तन से गन्धक जमा होता हुआ देखा गया है।
पञ्जाब- में डेरागाजी खान के सोरीपास नामक स्थान पर गन्धक निकालने का कारोबार चलता था। यहां पर गन्धक गोदन्ती के साथ उष्ण स्रोतों में जमा हुआ दिखाई देता है। गोदन्ती के अन्दर पीत गन्धक के रेशे या शिरायें मिली पाई जाती हैं। कोहाट की भांति डमरू यन्त्र से उड़ाकर शुद्ध गन्धक एकत्रित करने का व्यवहार यहां भी चालू था। गन्धारी पहाड़ के दक्षिणी किनारे पर सफेद क्षेत्रों में भी गन्धक पाया जाता है।
झङ्ग ( Jhang ) राज्य में किराना पहाड़ी के पाषाणों में कान्त माक्षिक ( Pyrrhotite ) के ढेले पाये गये हैं। हुन्डी वाला नामक स्थान की खान में भी रेलवे स्टेशन के पास विमल के नमूने प्राप्त हुये हैं।
मियां वाला ( Mian wala ) ज़िले में पेट्रोलियम प्राप्ति की जमीन में गन्धक
तृतीयोऽध्यायः । १०९
तृतीयोऽध्यायः । १०९
पाया जाता है। बोरिङ्ग ( Bowring ) नामक स्थान के पास पेट्रोलियम के स्रोत के समीप समीप मीलों तक पहाड़ी भूमि पर गोदन्ती के साथ गन्धक पाया जाता है। किन्तु यहां पर व्यापारोपयोगी गन्धक की मात्रा मिलने में सन्देह है।
रावल पिंडी के जिले में मशालापास के पूर्वी ओर की पहाड़ी पर गन्धक की खान में काम होता रहा है।
संयुक्त प्रान्त— के देहरादून, जोन्सार जिलों में मेवार ( Maiwar ) नामक स्थान की सीसक ( Lead ) की खान की परिधि में गन्धक पाया जाता है और उसका इतना निकास होता है कि जिससे सीसक निकालने का सारा व्यय प्राप्त हो जाया करता है।
कुमायूँ— जिले के उष्ण स्रोतों से अल्प मात्रा में गन्धक जमा पाया जाता है। कुमायूँ प्रान्त के नीचे लिखे स्थानों का गन्धक प्राप्ति के विषय में विशेषतः उल्लेख है— ( १ ) राम गङ्गा और गजियर नदी के तटवर्ती उष्णस्रोत । ( २ ) नन्द प्रयाग के पास मन्सियारी मुल्ला, दसोली और मुल्लानागपुरा ।
उक्त स्थानों के अतिरिक्त अनेक उष्ण स्रोतों के आसपास में न्यूनाधिक मात्रा में गन्धक पाया जाता है उसको शैलोदक ( Mineral waters ) कहते हैं ।
आज कल माक्षिक का (गन्धक युक्त होने के कारण) गन्धकाम्ल बनाने के लिये अधिकतया व्यवहार किया जाता है। इसलिये गन्धक प्रसङ्ग में गन्धकाम्ल (Sulphuric acid) का संक्षिप्त ब्योरा जानना आवश्यक है। संसार व्यापी यूरोपियन युद्ध के कुछ ही पूर्व युनाइटेड स्टेट्स में लगभग ३५०,००० छोटे टन ( Short tons ) गन्धकाम्ल बनता था। युद्ध की दशा में विस्फोटक ( Explosive ) पदार्थों के निर्माण के लिये इसकी मांग अधिक हो गई। सन् १९१६ में ६२१० ००० टन गन्ध-काम्ल बनाया गया और १९१८ में ८०००००० टन तय्यार किया गया। सन् १९१६ ई० में ४० फी सदी गन्धकाम्ल स्पेनिश माक्षिक ले कर बनाया गया था। शेष ६ फी सदी केनाडियन माक्षिक, १३ फी सदी अमेरिकन माक्षिक, २२ फी सदी ताम्र और यशद के खनिज गलाने से उत्पन्न गन्धकीय वाष्प और शेष १९ फी सदी प्राकृतिक गन्धक लेकर बनाया जाता है। युद्ध के पूर्व प्राकृतिक गन्धक का उपयोग इस कार्य के लिये नहीं किया जाता रहा है। इस लेख से यह स्पष्ट है कि माक्षिक अन्य गन्धक के खनिजों के साथ या स्वतन्त्र ही गन्धकाम्ल बनाने के लिये प्रधानता से उपयोग किया जा रहा है। इस काम के लिये अनेक देश, विशेष कर स्पेन, नारवे (Norway) पोर्चुगाल (Portugal), फ्रान्स, युनाइटेड स्टेट्स आफ अमेरिका, जर्मनी २,००००० टन से अधिक माक्षिक की प्रतिवर्ष निकासी करते हैं।
११० | रसरत्नसमुच्चये—
युनाइटेड स्टेट्स आफ अमेरिका में गन्धक प्राप्ति के मुख्य खनिज माक्षिक और विमल (Pyrite marcasite pyrrhotite) ५३˙३% व ३८˙४% फीसदी वाले क्रमशः समझे जाते हैं।
इसी प्रकार पाश्चात्य वैज्ञानिक साहित्य में ज्वलन शक्ति के कारण इसको सल्फर (Sulphur) अर्थात् ज्वलन-शील-लवण के अभिधान से सम्बोधित किया है।
अथ गैरिकम्—
गैरिकभेदाः—
पाषाणगैरिकं चैकं द्वितीयं स्वर्णगैरिकम् ॥ ४६ ॥
गैरिक दो प्रकार का होता है एक को पाषाण गैरिक तथा दूसरे को स्वर्ण गैरिक कहते हैं ॥ ४६ ॥
विमर्शः— गैरिक को साधारणतया हीमोटाइट (Heamotite) कहते हैं। इसके दो भेद हैं प्रथम पाषाणगैरिक तथा द्वितीय स्वर्णगैरिक (Kidney Iron ore) है। यह द्वितीय प्रकार का खनिज भारत वर्ष में अल्पमात्रा में मिलता है किन्तु अमेरीका और जर्मन में अधिक मात्रा में मिलता है इसको गैरिक का मणि समझना चाहिए। जहां तक हो सके औषध कर्म में स्वर्ण गैरिक का ही प्रयोग करना चाहिए। गैरिक लौह का प्रधान खनिज है। यह रेड आयर्न आक्साइड (Red Iron oxide) है। ताता (टाटा) के कारखाने में इससे लोह (Iron) निकाला जाता है।
पाषाणस्वर्णगैरिकयोर्लक्षणम्—
पाषाणगैरिकं प्रोक्तं कठिनं ताम्रवर्णकम्।
अत्यन्तशोणितं स्निग्धं मसृणं स्वर्णगैरिकम् ॥ ४७ ॥
स्वादु स्निग्धं हिमं नेत्र्यं कषायं रक्तपित्तनुत्।
हिष्मावमिविषघ्नं च रक्तघ्नं स्वर्णगैरिकम्।
पाषाणगैरिकं चान्यत्पूर्वस्मादल्पकं गुणे ॥ ४८ ॥
पाषाण गैरिक स्पर्श में कठिन तथा ताम्रवर्ण का होता है, स्वर्ण गैरिक अत्यन्त रक्तवर्ण तथा स्निग्ध और कोमल होता है। यह स्वर्ण गैरिक स्वादु, स्निग्ध, शीतल, नेत्रहितकर, कसैला और रक्तपित्त को नष्ट करता है और हिचकी, वमन, विष इन का नाशक है, रक्तस्राव को नष्ट करता है। पाषाणगैरिक स्वर्णगैरिक से कुछ कम गुणवाला होता है ॥ ४७–४८ ॥
तृतीयोऽध्यायः । १११
तृतीयोऽध्यायः । १११
अथ गैरिकशोधनम्—
गैरिकं तु गवां दुग्धैर्भावितं शुद्धिमृच्छति ॥ ४९ ॥ गैरिकं सत्त्वरूपं हि नन्दिना परिकीर्तितम् ॥ ५० ॥ कैरप्युक्तं पतेत्सत्त्वं क्षाराम्लस्विन्नगैरिकात् । उपतिष्ठति सूतेन्द्रमेकत्वं गुणवत्तरम् ॥ ५१ ॥
गैरिक गोदुग्ध से भावना देने पर शुद्ध हो जाता है । नन्दी नामक सिद्ध ने गैरिक को सत्त्व स्वरूप ही बताया है । कुछ लोगों का मत है कि क्षार और अम्ल में स्वेदन करने से गैरिक से सत्त्व निकलता है। गैरिक सत्त्व पारद में मिल जाता है और अधिक गुणकर होता है ॥ ४९-५१ ॥
अथ कासीसरसायनम्— तत्रादौ कासीसभेदाः—
कासीसं वालुकाद्येकं पुष्पपूर्वमथापरम् ॥ ५२ ॥
कासीस दो तरह का होता है। एक को बालु काकासीस तथा द्वितीय को पुष्प कासीस कहते हैं । बालु कासीस को धातु कासीस भी कहते हैं ॥ ५२ ॥
**विमर्शः—**कासीस को साधारणतया आजकल फेराइ सल्फ ( Ferri Sulph ) अथवा फेरस सल्फेट ( Ferrous Sulphate ) कहते हैं । यह लौह और गन्धक का यौगिक है। यह आजकल प्रायः कृत्रिम ही मिलता है तथा लौह पर गन्धक के तेजाब गन्धकाम्ल ( Sulphuric Acid ) के प्रयोग से तय्यार किया जाता है । प्रायः प्राकृतिक या कृत्रिम कासीस हरे क्रिस्टलीय रूप में पाया जाता है। यह मडुर होता है तथा जल में विलेय (Soluble) है तथा उस में घुल कर विलयन (Solution) बनता है। इसको अग्नि पर गरम करने से इसमें से जल निकलता है इस जल को क्रिस्टलीकरण का जल ( Water of Crystallisation ) कहते हैं । इसी जल के कारण यह क्रिस्टल के रूप में प्राप्त होता है । इस प्रकार तपाने से जल निकल जाने पर जो चूर्ण अवशेष रह जाता है वह सफेद रङ्ग का हो जाता है । अतः जल ही के कारण यह क्रिस्टल के रूप में प्राप्त होता है। इसको ज्यादा गरम करने से इससे प्रथम जल निकलता है फिर सफेद रङ्ग का धुआं निकलता है जिसे यदि द्रवीभूत करके परीक्षा करें तो मालूम होता है कि वह तेल ( oil ) सा गाढा पदार्थ है । इसकी कुछ बूंदे जल में डालकर स्वाद लेने से खट्टा मालूम होता है तथा इस कासीस के द्रवीभूत धुम्र को लकड़ी या कपड़ों पर डालें तो वे झुलस जावेंगे । परीक्षा करने से यह गन्धकाम्ल ( Sulphuric
११२ रसरत्नसमुच्चये—
Acid) सिद्ध हुआ है । इस निर्णय के पहिले इसको कसीस का तैल कहते थे । इसके निकल जाने से जो पदार्थ शेष रहता है वह कासीस के गुणधर्मों से भिन्न होता है । इस द्रव्यका रङ्ग कपिल होता है तथा जल में डालने से यह बिलकुल अविलय ( In Soluble ) है तथा देखने में भी मोरचे के समान प्रतीत होता है । जो क्रिस्टल स्वरूप कासीस है, उसे पुष्पकासीस समझना चाहिए और उसका सूत्र यह ( Fe Soy TH 20 ) है । जो आक्साई के रूप में हो जाता है उसको वालु कासीस समझना चाहिए, तथा उसका सूत्र ( Fe Soy ) है । प्रायः औषध कर्म में पुष्प कासीस को ही अधिक गुणकर होने से ग्रहण करना चाहिए ।
वालुकासीसगुणाः—
क्षाराम्लागुरुधूमाभं सोष्णवीर्यं विषापहम् ।
वालुकापूर्वकासीसं श्वित्रघ्नं केशरञ्जनम् ॥ ५३ ॥
बालुकाकासीस क्षार, अम्ल और गुरु होता है तथा वर्ण में धूएं के सदृश होता है और वीर्य में उष्ण और विष विकारों को विनष्ट कर देता है तथा सफेद कुष्ठ को नष्ट करता है और केशों को काले रंग का कर देता है ॥ ५३ ॥
पुष्पकासीसगुणाः—
पुष्पादिकासीसमतिप्रशस्तं सोष्णं कषायाम्लमतीव नेत्र्यम् ।
विषानिलश्लेष्मगदव्रणघ्नं श्वित्रक्षयघ्नं कचरञ्जनञ्च ॥ ५४ ॥
पुष्प कासीस औषध कर्म में श्रेष्ठ है । यह उष्णवीर्य, कषाय और अम्ल होता है । नेत्रों के लिये अत्यन्त हितकर है और विषवाधा, वात और कफ से जन्यरोग, व्रण तथा श्वेतकुष्ठ को नष्ट करता है, शिर के बालों को काला करता है ॥ ५४ ॥
कासीसशोधनम्—
सकृद्भृङ्गाम्बुना क्लिन्नं कासीसं निर्मलं भवेत् ॥ ५५ ॥
कासीस का चूर्ण कर भृङ्गराज के स्वरस या क्वाथ में एक बार भिगो देने से शुद्ध हो जाता है ॥ ५५ ॥
सत्त्वग्रहणनिर्देशः—
तुवरीसत्त्ववत्सत्त्वमेतस्यापि समाहरेत् ॥ ५६ ॥
वक्ष्यमाण तुवरी ( फिटकरी ) के सत्त्व के निष्कासन की विधि के समान इसका भी सत्त्व निकाल कर ग्रहण करना चाहिए ॥ ५६ ॥
तृतीयोऽध्यायः । ११३
तृतीयोऽध्यायः । ११३
अथ शोधनान्तरम्—
कासीसं शुद्धिमाप्नोति पित्तैश्च रजसा स्त्रियाः ॥ ५७ ॥
कासीस को पञ्चपित्त ( वराह, छाग, महिष, मत्स्य, मयूरपित्त, ) और स्त्री के मासिक धर्म कालीन शोणित से भिगो देने पर शुद्धि होती है ॥ ५७ ॥
कासीसप्रयोगः—
बलिना हतकासीसं क्रान्तं कासीसमारितम् ।
उभयं समभागं हि त्रिफलावेल्लसंयुतम् ॥ ५८ ॥
विषमांशघृतक्षौद्रप्लुतं शाणमितं प्रगे ।
सेवितं हन्ति वेगेन श्वित्रं पाण्डुक्षयामयम् ॥ ५९ ॥
गुल्मप्लीहगदं शूलं मूलरोगं विशेषतः ।
रसायनविधानेन सेवितं वत्सरावधि ॥ ६० ॥
आमसंशोषणं श्रेष्ठं मन्दाग्निपरदीपनम् ।
पलितं वलिभिः सार्धं विनाशयति निश्चितम् ॥ ६१ ॥
इति कासीसाधिकारः ।
गन्धक से मारण की हुई कासीस भस्म और कासीस से मारण की हुई लौह भस्म या वैक्रान्तभस्म इन दोनों को समान भाग लेकर खरल में घोट लें इसमें से एक शाण (चोअन्नी) भर लेकर त्रिफला चूर्ण और वायविडङ्गचूर्ण विषम मात्रा से घृत तथा मधु मिलाकर प्रातःकाल नित्य सेवन करने से श्वेत कुष्ठ, पाण्डु, क्षयरोग, पञ्चप्रकार के गुल्म, प्लीहवृद्धि, शूल, अर्श नष्ट होते हैं । इस योग को रसायन-विधि से एकवर्ष पर्यन्त सेवन करने से आंवरोग सूख जाता है, मन्दाग्नि दीप्त हो जाती है, बालों का श्वेत होना तथा गिरना दोनों रोग निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं ॥ ५८-६१ ॥
अथ तुवरीनिरूपणम्—
तुवरीपरिचयः—
सौराष्ट्राश्मनि सम्भूता मृत्स्ना सा तुवरी मता ।
वस्त्रेषु लिप्यते यासौ मञ्जिष्ठारागबन्धिनी ॥ ६२ ॥
सोराष्ट्रदेश के पत्थरों की खान से पैदा होने वाली मृत्तिका को तुवरी
रस० ८
११४ रसरत्नसमुच्चये—
( फिटकरी ) कहते हैं । यह वस्त्रों को रंग देती है तथा मंजीठ के रंग को पक्का बनाती है ॥ ६२ ॥
विमर्शः— तुवरी वह मृत्तिका है कि जिस का शुद्ध करके फिटकरी बनाते हैं । बङ्गाल केमिकल और फार्मास्यूटिकल कम्पनी कलकत्ता आदि स्थान इसका अधिक निर्माण करते हैं ।
तुवरीभेदा:—
फटकी फुल्लिका चेति द्वितीया परिकीर्तिता ॥ ६३ ॥
इसी का द्वितीय भेद फुल्लिका या फूलफिटकरी कहलाता ॥ ६३ ॥
तुवरीलक्षणगुणा:—
ईषत्पीता गुरुः स्निग्धा पीतिकाविषनाशिनी ।
व्रणकुष्ठहरा सर्वकुष्ठघ्नी च विशेषतः ॥ ६४ ॥
निर्भारा शुभ्रवर्णा च स्निग्धा साम्लाऽपरा मता ।
सा फुल्ला तुवरी प्रोक्ता लेपात्ताम्रं चरेद्यः ॥ ६५ ॥
काङ्क्षी कषाया कटुकाम्लकण्ठ्या केश्या व्रणघ्नी विषनाशिनी च ।
श्वित्रापहा नेत्रहिता त्रिदोषशान्तिप्रदा पारदजारणी च ॥ ६६ ॥
फिटकरी कुछ पीत, स्निग्ध और भारी होती है तथा विष, व्रण, कुष्ठ को नष्ट करती है । जो फिटकरी श्वेत होती है वह भार में हलकी, स्निग्ध और खट्टी होती है, इसे फूल फिटकरी कहते हैं । ताम्र पर इसका लेप करने से शीघ्र भस्म हो जाती है । फिटकरी कषाय, कटु तथा अम्ल स्वादवाली होती है । यह कण्ठ और केशों को लाभ पहुंचाती है । व्रणविष, श्वेतकुष्ठ को नष्ट करती है तथा त्रिदोष को साम्यावस्था में रखती है । इससे पारद का जारण हो जाता है ॥ ६४–६६ ॥
अथ तुवरीशोधनम्—
तुवरी काञ्जिके क्षिप्ता त्रिदिनाच्छुद्धिमृच्छति ॥ ६७ ॥
फिटकरी को तीन दिन तक काञ्जी में डालकर रखने से शुद्ध हो जाती है॥६७॥
तुवरीसत्त्वपातनविधिः—
क्षाराम्लैर्मर्दिता ध्माता सत्त्वं मुञ्चति निश्चितम् ॥ ६८ ॥
गोपित्तेन शतं वारान् सौराष्ट्रीं भावयेत्ततः ।
धमित्वा पातयेत्सत्त्वं क्रामणं चातिगुह्यकम् ॥ ६९ ॥
इति तुवर्याधिकारः ।
तृतीयोऽध्यायः। [११५]
इसको क्षार और अम्ल पदार्थों के साथ घोटकर फूंकने से औषधोपयोगी सत्त्व निकलता है। अथवा गोपित्त (गोरोचन) से सौ भावना देकर फूंक कर सत्त्वपातन करना चाहिए। यह सत्त्व रस तथा उपरसों के बन्धन करने में श्रेष्ठ है तथा गोपनीय है ॥ ६८-६९ ॥
अथ तालकसन्निरूपणम्—
तालकभेदाः—
हरतालं द्विधा प्रोक्तं पत्राद्यं पिण्डसंज्ञकम् ॥ ७० ॥
हरताल दो तरह की होती है, एक पत्र हरताल और दूसरी पिण्डहरताल कहलाती है ॥ ७० ॥
पत्रतालकलक्षणम्—
स्वर्णवर्णं गुरु स्निग्धं तनुपत्रञ्च भासुरम् ।
तत्पत्रतालकं प्रोक्तं बहुपुत्रं रसायनम् ॥ ७१ ॥
जो हरताल सुवर्ण के समान पीतवर्ण, भारी, स्निग्ध और छोटे २ पत्रों की रचना वाली तथा चमकती हुई होती है उसे पत्रहरताल कहते हैं। यह पुत्र देने वाली और रसायन गुणदायक होती है ॥ ७१ ॥
पिण्डतालकलक्षणम्—
निष्पत्रं पिण्डसदृशं स्वल्पसत्त्वं तथा गुरु ।
स्त्रीपुष्पहरं तच्च गुणालपं पिण्डतालकम् ॥ ७२ ॥
जो हरताल पत्ररचनारहित, पिण्डसदृश, अल्पसार और भारी होती है उसे पिण्डहरताल कहते हैं। यह स्त्रियों के मासिक धर्म को नष्ट करती है तथा पत्रहरताल से अल्प गुणों वाली होती हैं ॥ ७२ ॥
विमर्शः— हरताल गन्धक और सङ्खिया का यौगिक है। मनःशिला भी गन्धक और सङ्खिया का यौगिक है किन्तु इनके अणुओं के सङ्गठन के कारण गुणों में भेद हो जाता है और इसी लिये ये दोनों पदार्थ पृथक् २ लिखे गये हैं। आजकल प्रायः ये दोनों पदार्थ कृत्रिम ही बाजार में मिलते हैं किन्तु भारतवर्ष के अल्मोड़ा के पहाड़ों की खानों में तथा अन्य देशों में प्राकृतिक भी मिलते हैं। हरताल को आर्पिमेण्ट ( Arpiment ) कहते हैं। इसके शास्त्रों में जो भेद हैं उनका वर्णन मूल में देखिये।
अथ गुणाः—
श्लेष्मरक्तविषवातभूतनुत्केवलञ्च खलु पुष्पहारिस्त्रियाः ।
११६ रसरत्नसमुच्चये—
स्निग्धमुष्णकटुकञ्च दीपनं कुष्ठहारि हरितालमुच्यते ॥ ७३ ॥
हरताल दूषित कफ, रक्तविकार, विष, भूतवाधा (कृमियों का आक्रमण) और वायु के विकारों को दूर करती है। स्त्रियों के मासिकधर्म को नष्ट करती है और स्निग्ध, उष्ण, कड़वी तथा अग्निदीपक और कुष्ठ को नष्ट करती है ॥ ७३ ॥
अथ हरतालशुद्धिः—
स्विन्नं कूष्माण्डतोये वा तिलक्षारजलेऽपि वा ।
तोये वा चूर्णसंयुक्ते दोलायन्त्रेण शुद्ध्यति ॥ ७४ ॥
हरताल को दोलायन्त्रद्वारा कुष्माण्डस्वरस, तिलक्षारोदक या चूने के जल में स्वेदन करने से शुद्ध हो जाती है ॥ ७४ ॥
अशुद्धतालसेवनदोषाः—
अशुद्धं तालमायुर्घ्नं कफमारुतमेहकृत् ।
तापस्फोटाङ्गसङ्कोचं कुरुते तेन शोधयेत् ॥ ७५ ॥
अशुद्ध हरताल आयु को नष्ट करती है, कफ तथा वायु के रोग और प्रमेह उत्पन्न करती है। शरीर में जलन, सङ्कोच और फोड़ा फुन्सी उत्पन्न करती है, इस कारण इसका शोधन करना चाहिये ॥ ७५ ॥
मतान्तरेण तालशोधनम् ।
तालकं कणशः कृत्वा दशांशेन च टङ्कणम् ।
जम्बीरोत्थद्रवैः क्षाल्यं काञ्जिकैः क्षालयेत्ततः ॥ ७६ ॥
वस्त्रे चतुर्गुणे बद्ध्वा दोलायन्त्रे दिनं पचेत् ।
सचूर्णेनारनालेन दिनं कूष्माण्डजे रसे ।
स्वेद्यं वा शाल्मलीतोयैस्तालकं शुद्धिमाप्नुयात् ॥ ७७ ॥
हरताल के टुकड़े २ कर के उसमें दशमांश सुहागा मिलाकर निम्बूरस से सात वार और काञ्जी से भी सातवार घोट के धोकर चारपर्त किए वस्त्र में बांध कर दोलायन्त्र द्वारा एक दिन तक चूनामली हुई काञ्जी में स्वेदन करें अथवा कुष्माण्ड जल में या शाल्मली रस में स्वेदन करें इस तरह ताल शुद्ध हो जाती है ॥ ७६–७७ ॥
अथ मतान्तरेण शोधनमारणनिरूपणम्—
मधुतुल्ये घनीभूते कषाये ब्रह्ममूलजे ।
त्रिवारं तालकं भाव्यं पिष्ट्वा मूत्रेऽथ माहिषे ॥ ७८ ॥
तृतीयोऽध्यायः । ११७
तृतीयोऽध्यायः । ११७
उपलेर्दशभिर्देयं पुटं रुद्ध्वाथ पेषयेत् । एवं द्वादशधा पाच्यं शुद्धं योगेषु योजयेत् ॥ ७९ ॥
ढाक ( पलाश ) की जड़ का शहद के समान गाढा क्वाथ बनाकर इससे तीन वार शुद्ध हरताल को भावित कर पश्चात् भैंस के मूत्र में घोटकर गोला बना-कर सम्पुट में रख कर कपड़ मिट्टी द्वारा बन्दकर दस जङ्गली उपलों से पुट देना चाहिए । इस तरह द्वादश पुट देने से हरताल शुद्ध तथा मृत हो जाती है । इसको योग बनाने में लेना चाहिये ॥ ७८-७९ ॥
सत्त्वपातनम्—
कुलित्थक्वाथसौभाग्यमहिष्याज्यमधुप्लुतम् । स्थाल्यां क्षिप्त्वा विदध्याच्च मल्लेन छिद्रयोगिना ॥ ८० ॥ सम्यङ् निरुध्य शिखिनं ज्वालयेत्क्रमवर्धितम् । एकप्रहरमात्रं हि रन्ध्रमाच्छाद्य गोमयैः ॥ ८१ ॥ यामान्ते छिद्रमुद्घाट्य दृष्टे धूमे च पाण्डुरे । शीतां स्थालीं समुत्तार्य सत्त्वमुत्कृष्य चाहरेत् ॥ ८२ ॥ सर्वपाषाणसत्त्वानां प्रकाराः सन्ति कोटिशः । ग्रन्थविस्तरभीत्याऽत्र लिखिता न मया खलु ॥ ८३ ॥
शुद्ध हरताल तथा सुहागा समान भाग लेकर कुलत्थ क्वाथ, भैंस का घी और शहद के साथ घोटकर गोला बना लें, उस गोले को एक हण्डिका में रख कर मध्यछिद्र युक्त सकोरे से हण्डिका ढक दें । पश्चात् अच्छी प्रकार सन्धि बन्धन कर अग्नि जलानी चाहिए । एक प्रहर तक अग्नि मन्द मध्य तथा तीव्र देनी चाहिये तथा शराव के मध्य छिद्र को आर्द्र गोबर से ढक देनी चाहिए । एक प्रहर के अन्त में गोबर को हटाकर छिद्र से देखना चाहिए, यदि देखने से श्वेत ( पाण्डुर ) धूम दिखाई दें तब अग्नि बन्दकर स्वाङ्ग शीत होने पर स्थाली उतारना चाहिए ( एक प्रहर अग्नि देना साधारण कहा है ) फिर सन्धि तोड़कर हण्डिका में लगे हुए सत्त्व को ग्रहण करें । इसी तरह अन्य खनिज पाषाणपदार्थों के सत्त्व निकालने के अनेक प्रकार हैं उन्हें यहां ग्रन्थ विस्तार के भय से नहीं लिखे हैं ॥ ८०-८३ ॥
अथ मतान्तरम्—
पलालकं रवेर्दुग्धैर्दिनमेकं विमर्दयेत् ।
२१८ | रसरत्नसमुच्चये—
क्षिप्तवा षोडशिकातैले मिश्रयित्वां ततः पचेत् ॥ ८४ ॥
ऽनावृतप्रदेशे च सप्तयामावधि ध्रुवम् ।
स्वाङ्गशीतमधःस्थञ्च सत्त्वं श्वेतं समाहरेत् ॥ ८५ ॥
छागलस्याथ बालेन बलिना च समन्वितम् ।
तालकं दिवसद्वन्द्वं मर्दयित्वाऽतियत्नतः ॥ ८६ ॥
युक्तं द्रावणवर्गेण काचकूप्यां विनिःक्षिपेत् ।
त्रिधा ताञ्च मृदा लिप्त्वा परिशोष्य खरातपे ॥ ८७ ॥
ततः खर्परकच्छिद्रे तामूर्ध्वां चैव कूपिकाम् ।
प्रवेश्य ज्वालयेदग्निं द्वादशप्रहरावधि ॥
कूपिकण्ठस्थितं शीतं शुद्धं सत्त्वं समाहरेत् ॥ ८८ ॥
पलार्धप्रमितं तालं बद्ध्वां वस्त्रे सिते दृढे ।
बलिनाऽऽलिप्य यत्नेन त्रिवारं परिशोष्य च ॥ ८९ ॥
द्राविते त्रिपले ताम्रे क्षिपेत्तालकपोटलीम् ।
भस्मनाच्छादयेच्छीघ्रं ताम्रेणाऽऽवेष्टितं सितम् ॥
मृदुलं सत्त्वमादद्यात्प्रोक्तं रसरसायने ॥ ९० ॥
इति तालकाधिकारः—
एक पल (चार तोले) भर शुद्ध हरताल को मदार के दुग्ध से एक दिन तक घोटकर एक पल तिल के तैल में मिश्रण कर खुले स्थान में वालुका यन्त्र द्वारा सात प्रहर तक पाक करना चाहिए । स्वाङ्ग शीत होने पर नीचे निकले हुए श्वेत सत्त्व को ग्रहण करें अथवा छाग के पुच्छ के बाल और गन्धक को हरताल के साथ दो दिन तक घोटकर उसमें द्रावक वर्ग के पदार्थ (शहद्, घी, सुहागा) मिलाकर काच कूपी ( आतसी शीशी ) में भर कर तीन कपड़ मिट्टी करके धूप में सुखालें फिर मध्यछिद्र युक्त मिट्टी के कुण्डे में बालु भर कर आतसी शीशी रख दें ( आधी शीशी बालु से ढकी रहनी चाहिए ) पश्चात्, २ प्रहर तक अग्नि देना चाहिये । स्वाङ्ग शीत होने पर कूपिकण्ठ में लगे हुए श्वेत सत्त्व को ग्रहण करे । अथवा आधे पल ( २ तोला ) शुद्ध हरताल को श्वेत मजबूत वस्त्र में बांधकर पोटली बनालें । उस पोटली को तीन वार गोमूत्र में पिसे हुए गन्धक से लेपकर धूप में सुखाले । फिर तीन पल द्रव हुए ताम्र में पोटली रखकर
तृतीयोऽध्यायः । ११९
तृतीयोऽध्यायः । ११९
राख से अच्छी प्रकार पोटली को ढक दें कुछ काल के बाद ताम्र पर निकली हुई । श्वेत और मृदु सत्त्व को रस और रसायन के लिये ग्रहण करे ।॥ ८४-९० ॥
अथ मनःशिलानिरूपणम्—
मनःशिलाया भेदाः—
मनःशिला त्रिधा प्रोक्ता श्यामाङ्गी कणवीरका ।
खण्डाख्या चेति तद्रूपं विविच्य परिकथ्यते ॥ ९१ ॥
मनःशिला तीन प्रकार की होती है । (१) श्यामाङ्गी, (२) कणवीरका, (३) खण्डाख्या, ॥ ९१ ॥
त्रिविधमनःशिलालक्षणानि—
श्यामा रक्ता सगौरा च भाराढ्या श्यामिका मता ।
तेजस्विनी च निर्गौरा ताम्राभा कणवीरका ॥ ९२ ॥
चूर्णीभूताऽतिरक्ताङ्गी सभारा खण्डपूर्विका ।
उत्तरोत्तरतः श्रेष्ठा भूरिसत्त्वा प्रकीर्तिता ॥ ९३ ॥
जो काली, लाल तथा गौर (सर्षपवर्ण) वर्ण मिश्रित और भारी होती है उसको श्यामाङ्गी कहते हैं। जो तेज युक्त तथा ताम्र समान चमकदार हो और गौर-वर्ण रहित हो उसको कणवीरका कहते हैं और जो चूर्ण के रूप में हो तथा अत्यन्त रक्त तथा भारयुक्त हो उसको खण्डाख्य मैन शील कहते हैं। इन तीनों में उत्तरोत्तर श्रेष्ठ तथा ज्यादा सत्त्ववाली होती हैं ॥ ९२-९३ ॥
अथ गुणाः—
मनःशिला सर्वरसायनाग्र्या तिक्ता कटूष्णा कफवातहन्त्री ।
सत्त्वात्मिका भूतविषाग्निमान्द्यकण्डूतिकासाक्षयहारिणी च ॥ ९४ ॥
मनःशिला सब रसायनों में श्रेष्ठ तथा तिक्त, कटु, उष्ण और कफ, वात को नष्ट करती है तथा अधिक सत्त्व वाली शिला भूत, विष, अग्निमांद्य, कण्डू, कास और क्षय रोग को नष्ट करती है ॥ ९४ ॥
अशुद्धशुद्धदोषगुणाः—
अश्मरीं मूत्रकृच्छ्रञ्च अशुद्धा कुरुते शिला ।
मन्दाग्निं मलबन्धं च शुद्धा सर्वरुजापहा ॥ ९५ ॥
अशुद्ध मनःशिला अश्मरी, मूत्रकृच्छ्र, मन्दाग्नि और मलबन्ध करती है, किन्तु शुद्ध करने पर सकल व्याधियों को नष्ट करती है ॥ ९५ ॥
१२० रसरत्नसमुच्चये—
अथ शोधनम्— अगस्त्यपत्रतोयेन भाविता सप्तवारकम् । शृङ्गवेररसैर्वाऽपि विशुद्ध्यति मनःशिला ॥ ९६ ॥ मैन शील को अगस्त्य वृक्ष के पत्र के स्वरस से या अदरक (आदी) स्वरस से सात वार भावना देने से शुद्ध हो जाती है ॥ ९६ ॥
मतान्तरम्— जयन्तीभृङ्गराजोत्थरक्तागस्त्यरसैः शिलाम् । दोलायन्त्रे पचेद्यामं यामं छागोत्थमूत्रकैः । क्षालयेदारनालेन सर्वरोगेषु योजयेत् ॥ ९७ ॥ अथवा जयन्ती, भृङ्गराज, रक्त अगस्त्य इन में से किसी एक के रस से दोलायन्त्र में एक प्रहर स्वेदन करके पश्चात् उसी प्रकार बकरी के मूत्र में पकावे फिर काञ्जी से धोकर सब रोगों में प्रयोग करे ॥ ९७ ॥
अथ सत्त्वपातनम्— अष्टमांशेन किट्टेन गुडगुग्गुलुसर्पिषा । कोष्ठ्यां रुद्ध्वा दृढं ध्माता सत्त्वं मुञ्चेन्मनःशिला ॥ ९८ ॥ शुद्ध मैनशील में अष्टमांश किट्ट ( मण्डूर ) और गुड़ गुग्गुल तथा घृत मिलाकर मूषायन्त्र में बन्दकर खूब फूंकने से सत्त्व निकल जाता है ॥ ९८ ॥
मतान्तरम्— भूनागधौतसौभाग्यमदनैश्च विमर्दितैः । कारवल्लीदलाम्भोभिर्मूषां कृत्वाऽत्र निक्षिपेत् ॥ ९९ ॥ शिलां क्षाराम्लनिष्पिष्टां प्रधमेत्तदनन्तरम् । कोकिलाद्वयमात्रं हि ध्मानात्सत्त्वं त्यजत्यसौ ॥ १०० ॥ इति मनःशिलाधिकारः । अथवा केञ्चुए (भूनाग) का सत्त्व, सुहागा, मैनफल इनका चूर्ण कर करेले के रस से मूषा का निर्माण कर उसमें क्षार और अम्ल रस में पिसी हुई मनः शिला रख कर कोयलों की आग में फूंकने से सत्त्व निकल जाता है ॥ ९९–१०० ॥
अथाञ्जनानां सन्निरूपणम्— अञ्जनभेदाः— सौवीरमञ्जनं प्रोक्तं रसाञ्जनमतः परम् ।
तृतीयोऽध्यायः। १२१
तृतीयोऽध्यायः। १२१
स्रोतोऽञ्जनं तदन्यच्च पुष्पाञ्जनकमेव च ।
नीलाञ्जनं च तेषां हि स्वरूपमिह वर्ण्यते ॥ १०१ ॥
अञ्जन पांच प्रकार के होते हैं, जैसे १ सौवीराञ्जन, २ रसाञ्जन (रसौंत), ३ स्रोतोऽञ्जन (कालासुरमा), ४ पुष्पाञ्जन (श्वेतसुरमा), ५ नीलाञ्जन (नील सुरमा) ये पांच भेद हैं ॥ १०१ ॥
विमर्श:— आजकल प्रायः बाजारों में असली अञ्जन नहीं मिलते हैं। इसका कारण प्रथम तो हमारा ही है, क्योंकि हम अच्छी प्रकार से परीक्षा नहीं करते हैं और सिर्फ अज्ञ पंसारी के भरोसे ही पर निर्भर रहते हैं। इसका नतीजा (परिणाम) यह निकलता है कि हमारी औषध शास्त्रोक्त फल नहीं करती है। इस लिये हम नीचे सब प्रकार के अञ्जनों के आधुनिक मत से लक्षण तथा गुण आदि लिख देते हैं। इन लक्षणों से उस द्रव्य की परीक्षा अच्छी प्रकार कर लेनी चाहिए तथा विश्वस्त स्थानों से ही मंगवाने चाहिए। शास्त्र में इनके निम्न पांच भेद किये गये हैं।
"सौवीरमञ्जनं प्रोक्तं रसाञ्जनमतः परम् ।
स्रोतोऽञ्जनं तदन्यच्च पुष्पाञ्जनकमेव च ।
नीलाञ्जनञ्च तेषां हि पञ्च भेदाः प्रकीर्तिताः ॥
१ सौवीराञ्जन-स्टिबनाइटिस (Stybnitis)
२ रसाञ्जन (यलो अक्साइड आफ़मर्करी Yellow, oxide of mercury)
३ स्रोतोऽञ्जन (अन्टीमनी सल्फाइड Antimony sulphide या वरनाग सुरमा)
४ पुष्पाञ्जन (जिन्क आक्साइड Zinc oxide)
५ नीलाञ्जन (गेलेना या लेड सल्फाइड Lead sulphide)
सौवीराञ्जन— यह नेत्र के लिये अच्छा है तथा यह अन्टिमनी (Antimony) और गन्धक (Sulphur) का यौगिक है। यह सुरमा बेली आसाम से आता है।
शास्त्र में इसका लक्षण यह है वल्मीकशिखराकारं भङ्गे नीलोत्पलद्युति। सौवीराञ्जनमित्याहुरायुर्वेद विदो जनाः ॥
रसाञ्जन— इसको यलो आकसाइड आफ मर्करी (Yellow oxide of Mercury) कहते हैं। आजकल प्रायः चिकित्सक रसाञ्जन शब्द से
"दार्वीक्वाथसमं क्षीरं पाद पक्त्वा यदा घनम् ।
तदा रसाञ्जनं ख्यातं………………इति ॥
इस भावप्रकाशोक्त लक्षण विधि से बने हुए द्रव्य ही को सर्वत्र ग्रहण करते हैं। किन्तु यह उचित नहीं है। जहां रसनिर्माण की प्रक्रिया हो वहां रसाञ्जन शब्द से "रसगर्भं रसाञ्जनम्, अर्थात् यलो आक्साइड आफ् मर्करी Yellow oxide of Mercury के नाम से जो खनिज आता
१२२ रसरत्नसमुच्चये—
है उसे लेना चाहिए तथा क्वाथ और चूर्णादि प्रक्रिया में भावप्रकाशोक्त रसाञ्जन का ग्रहण करें।
स्रोतोऽञ्जन— यह अन्टीमनी सल्फाइड (Antimony Sulphide) है। बर्मा और मैसूर में थोड़ा अन्टीमनी सल्फाइड प्राप्त होता है। आजकल सफेद सुरमे के नाम से बाजारों में जो द्रव्य मिलता है वह केलसाइट है उसे नहीं लेना चाहिए। वह चूने की जाति का एक पत्थर है स्रोतोऽञ्जन नहीं है।
पुष्पाञ्जन— यह Zinc oxide जिन्क आक्साइड है। इसे सफेदा भी कहते हैं। यह जैपुर में बहुत बनता है तथा आजकल पाश्चात्य चिकित्सक नेत्र के लिये यशद के योगों का अत्यन्त प्रयोग करते हैं।
नीलाञ्जन— यह लेड सल्फाइड (Lead sulphide) या गेलेना है। यह भी नेत्र के लिये हितकर है तथा बर्मा से अधिक आता है।
सौवीराञ्जनगुणाः— सौवीरमञ्जनं धूम्रं रक्तपित्तहरं हिमम् । विषहिध्माक्षिरोगघ्नं व्रणशोधनरोपणम् ॥ १०२ ॥
अब प्रत्येक का वर्णन करते हैं—सौवीराञ्जन धूम्र वर्ण का होता है। यह रक्तपित्त, विष, हिचकी और नेत्र के रोगों को नष्ट करता है तथा शीतल होता है, व्रण का शोधन करके भर देता है ॥ १०२ ॥
रसाञ्जनगुणाः— रसाञ्जनञ्च पीताभं विषवक्त्रगदापहम् । श्वासहिध्मापहं वर्ण्यं वातपित्तास्रनाशनम् ॥ १०३ ॥
रसाञ्जन कुछ पीले वर्ण का होता है। यह विषवाधा, मुखरोग, श्वास, हिचकी वातरक्त तथा रक्तपित्त को नष्ट करता है और वर्ण बढ़ाता है ॥ १०३ ॥
स्रोतोऽञ्जनगुणाः— स्रोतोऽञ्जनं हिमं स्निग्धं कषायं स्वादु लेखनम् । नेत्र्यं हिध्माविषच्छर्दिकफपित्तास्ररोगनुत् ॥ १०४ ॥
स्रोतोऽञ्जन शीत, स्निग्ध, कषाय, स्वादु तथा लेखन होता है। नेत्रों का हितकारक है और हिचकी, विषबाधा, वमन, कफ, रक्तपित्त इन रोगों को नष्ट करता है ॥ १०४ ॥
लेखनस्वरूपं— धातून् मलान्वा देहस्य विशोष्योल्लेखयेच्च यत् । लेखनं तद्यथा क्षौद्रं नीर मुष्णं वचा यवाः ॥
तृतीयोऽध्यायः । १२३
तृतीयोऽध्यायः । १२३
पुष्पाञ्जनगुणाः—
पुष्पाञ्जनं सितं स्निग्धं हिमं सर्वाक्षिरोगनुत् ।
अतिदुर्धरहिध्माघ्नं विषज्वरगदापहम् ॥ १०५ ॥
पुष्पाञ्जन श्वेत, स्निग्ध और शीतल होता है। समग्र नेत्रके रोगों को नष्ट करता है। दुःसाध्य हिचकी, विषवाधा तथा ज्वर को नष्टकरता है ॥ १०५ ॥
नीलाञ्जनगुणाः—
नीलाञ्जनं गुरु स्निग्धं नेत्र्यं दोषत्रयापहम् ।
रसायनं सुवर्णघ्नं लोहमार्दवकारकम् ॥ १०६ ॥
नीलाञ्जन गुरु, स्निग्ध, नेत्रहितकारी, दोषत्रयनाशक, रसायन और सुवर्ण भस्म करने में श्रेष्ठ (सहायक) और लोहे को मृदु करता है ॥ १०६ ॥
अथ शोधनम्—
अञ्जनानि विशुध्यन्ति भृङ्गराजनिजद्रवैः ॥ १०७ ॥
सब प्रकार के अञ्जन भृङ्गराज के स्वरस में घोटने से शुद्ध हो जाते हैं ॥ १०७ ॥
अञ्जनसत्त्वाहरणम्—
मनोह्वासत्त्ववत्सत्त्वमञ्जनानां समाहरेत् ॥ १०८ ॥
प्रायः सब अञ्जनों का सत्त्व मनः शिला की सत्त्वपातनविधि से प्राप्त होता है ॥ १०८ ॥
स्रोतोऽञ्जनलक्षणम्—
वल्मीकशिखराकारं भङ्गे नीलोत्पलद्युति ।
घृष्टं तु गैरिकच्छायं स्रोतोऽजं लक्षयेद्बुधः ॥ १०९ ॥
जो अञ्जन दीमकगृह के शिखर के स्वरूप का हो और तोड़ने पर नील कमल की प्रभा समान ज्ञात हो तथा घिसने से गैरिक के समान लाल हो वह स्रोतोऽञ्जन कहलाता है ॥ १०९ ॥
अञ्जनरसबन्धनम्—
गोशकृद्रसमूत्रेषु घृतक्षौद्रवसासु च ।
भावितं बहुशस्तच्च शीघ्रं बध्नाति सूतकम् ॥ ११० ॥
अञ्जन को गोर्वर के रस, गोमूत्र, घृत, शहद, वसाइन द्रव्यों में क्रमशः बहुत बार भावना देकर शुद्ध करने से वह शीघ्र ही पारद का बन्धन करता है ॥ ११० ॥
रसाञ्जनस्य विशेषशोधनम्—
सूर्यावर्तादियोगेन शुद्धमेति रसाञ्जनम् ॥ १११ ॥
१२४ रसरत्नसमुच्चये—
रसाञ्जन आगे कहे हुए सूर्यावर्तादियोगों से शुद्ध होता है ॥ १११ ॥
स्रोतोऽञ्जनसत्त्वपातनविधिः—
राजावर्तकवत्सत्त्वं ग्राह्यं स्रोतोऽञ्जनादपि ॥ ११२ ॥ इत्यञ्जनाधिकारः।
स्रोतोऽञ्जन का सत्त्वपातन राजावर्त के सत्त्वपातन की विधि से निकालना चाहिए ॥ ११२ ॥
अथ कङ्कुष्ठनिरूपणम्—
कङ्कुष्ठोत्पत्तिवर्णनं भेदाश्च—
हिमवत्पादशिखरे कङ्कुष्ठमुपजायते । तत्रैकं नालिकाख्यं हि तदन्यद्रेणुकं मतम् ॥ ११३ ॥
कङ्कुष्ठ की उत्पत्ति हिमालय पर्वत के समीपवर्ति शिखरों से होती है। यह नालिकाख्य और रेणुक नाम से दो तरह का होता है ॥ ११३ ॥
द्विविधकङ्कुष्ठलक्षणम्—
पीतप्रभं गुरु स्निग्धं श्रेष्ठं कङ्कुष्ठमादिमम् । श्यामपीतं लघु त्यक्तसत्त्वं नेष्टं हि रेणुकम् ॥ ११४ ॥
प्रथम नालिक नामक कङ्कुष्ठ पीतवर्ण, भारयुक्त तथा स्निग्ध होता है और वह औषध कार्यमें श्रेष्ठ है। रेणुककङ्कुष्ठ कुछ कृष्ण और पीतवर्ण युक्त, लघु तथा सत्त्व-रहित होता है वह औषधकार्य में इष्ट नहीं है ॥ ११४ ॥
कङ्कुष्ठोत्पत्तौ मतान्तराणि—
केचिद्वदन्ति कङ्कुष्ठं सद्योजातस्य दन्तिनः । वर्चश्च श्यामपीताभं रेचनं परिकथ्यते ॥ ११५ ॥ कतिचित्तेजिवाहानां नालं कङ्कुष्ठसंज्ञकम् । वदन्ति श्वेतपीताभं तदतीव विरेचनम् ॥ ११६ ॥
कुछ लोग कङ्कुष्ठ को हस्ती के सद्य उत्पन्न हुए बच्चे का मल कहते हैं और वह कृष्ण तथा पीत दोनों रंग का होता है तथा दस्तकारक होता है। कुछ लोग तेजस्वी अश्त्वों से उत्पन्न हुए बच्चे के नाभि नाल को कङ्कुष्ठ मानते हैं, इसका वर्ण कुछ सफेद और पीत होता है और वह अत्यन्त विरेचक होता है॥११५-११६॥
विमर्श:— कङ्कुष्ठ खनिज द्रव्य नहीं है। यह हिमालय के ऊपर या सन्निकट प्रदेश में उत्पन्न हुइ वनस्पति के रस से बनाया जाता है। इस रस को धातु या बांस की