भारतकोश
रसार्णव (शैव रस-तन्त्र - प्राचीन भारतीय खनिज रसायन, धातुवाद एवं रस-चिकित्सा सटीक)

रसार्णव (शैव रस-तन्त्र - प्राचीन भारतीय खनिज रसायन, धातुवाद एवं रस-चिकित्सा सटीक)

Rasarnava: Tantric Chemistry and Alchemy with Commentary

शिव-पार्वती संवाद (सम्पादक: प्रफुल्लचन्द्र राय एवं हरीशचन्द्र कविराज) द्वारा

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१४४ रसार्णवे देवदालीशिवावीजं¹ गुञ्जासैन्धवटङ्कणम्² । भावयेदम्लवर्गेण³ विड़ोऽयं हेमजारणः⁴ ॥ १६ ॥ मूलकार्ड्रक⁵चित्राणां क्षारैर्गोमूत्रगालितैः । गन्धकः शतशो भाव्यो विड़ोऽयं हेमजारणे ॥ १७ ॥ हरितालशिलाक्षारो⁶ लवणं शङ्खमृत्तिका⁸ । हंसपाकविपक्वोऽयं विड़ः स्याद्धेमजारणे ॥ १८ ॥ एवं संगृह्य सम्भारान् रसकर्म समाचरेत् । तन्ममाचक्ष्व देवेशि किमन्यच्छ्रोतुमिच्छसि ॥ १९ ॥ इति श्रीपार्वतीपरमेश्वरसंवादे⁹ रसार्णवे रससंहितायां विड़कथनो नाम¹⁰ नवमः पटलः ॥ ९ ॥ (1) K reads शिखाबीजं. M reads देवतालीशिवा, which is incomplete. (2) M reads गुञ्जाटङ्कणसैन्धवम्. (3) भावयेदाम्लवर्गेण, a variant in M. (4) विडायां हेमजारणे, a variant in M, wherein the first term is incorrect. (5) M reads erroneously मूलकाद्रुक. (6) K reads क्षारैः. (7) K reads भावन. (8) K has शरमृत्तिका, which destroys the metre. (9) This portion is not found in M. (10) M reads विड़कल्पो नाम.

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