रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६४ रसतरङ्गिणी कर उसके ऊपर जल को स्पर्श करती हुई एक पारदयुक्त मूषा रखकर (कच्छ- पयन्त्र की भाँति) उसको शराव से बन्द करके जारणायन्त्र या कच्छपयंत्र की भाँति अग्नि देवें । अन्यत्र सोमनालयन्त्र कें लक्षण इस प्रकार पाये जाते हैं- “गजवेल्लिग्रहं सम्यक् पात्रेऽधोमुखविस्तरे । तदर्द्धाच्छादनं रम्यं सोमनाल- मिहोदितम् ॥” रसपद्धति की टीका में इसे माक्षिक सत्त्व तथा अभ्रकसत्त्व के जारणार्थ प्रयोग में लिया है । क्योंकि इस यन्त्र में नीचे सोम ( जल ) भरा रहता है, बीच में मूषा के भीतर पारद रहता है और ऊपर अग्नि जलाते हैं । अतः इसे सोमनालयन्त्र कहा जाता है । ( र. र. स. ) हंसपाकयन्त्र एक खर्पर (मिट्टी के बनेहुए पतले चौड़े कुण्डे) में किनारों तक वालुका भर उसके ऊपर दूसरा चौड़ा ठीकरा या कुण्डा रख उसके ऊपर जवाखार आदि पञ्चक्षार तथा पाँचों नमक तथा पूर्वोक्त विड द्रवों को गोमूत्र के साथ एकत्र पीसकर रखें और धीरे २ मन्द अग्नि से पकावें । हंसपाकयन्त्र उत्तम वार्तिककारों ने इसे “हंस पाकयन्त्र” नाम से कहा है । हंस सूर्य को कहते हैं, इस यन्त्र में अग्नि प्रखर सूर्य की किरणों के बराबर देकर पाक किया जाता है। अतः इसे हंसपाक नाम से लिखा है । वह यन्त्र विड के पाकार्थ प्रयुक्त होता है । ( .र र. स. ) नाभियन्त्र लौह अथवा मिट्टी के तल भाग में पर्याप्त मोटी एक थाली बनावें । इसके किनारे चार अंगुल ऊँचे हों, इसके बीच में पारद-गन्धक आने योग्य एक