रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमस्तरङ्गः ९५ अडूसा, मकोय, गोखुरू, शरपोंखा, सफेद कोयल ( अपराजित ), चौलाई, ब्राह्मी, काली तुलसी, खरेंटी, काली कोयल, शतावर, शंखपुष्पी, श्वेतपुष्प आक, धतूरा, पनवाढ़, करञ्ज, ब्रह्मदण्डी, गिलोय, सैन्धानमक, पाढ़, इन्द्रायण मछेछी इन औषधियों के समुदाय को रसशास्त्रज्ञ नियामकगण कहते हैं ॥६१-६४॥ दीपनस्वरूपम् दोलायन्त्रे स्थापयित्वा रसेन्द्रं क्षाराद्यैर्येत्पाचनं स्याद्यथायम् । ग्रासार्थी वा जारणे च प्रगल्भः शास्त्रज्ञैस्तद्दीपनं सम्प्रदिष्टम् ॥६५॥ अथ दीपनस्वरूपम्-दीपनं नाम "ग्रासार्थिताजारणाभृततासम्पादकं दोलया क्षाराद्यैः पारदपाचनम् । धातुपाषाणमूलाद्यैः संयुक्तो घटमध्यगः। ग्रासार्थे त्रिदिनं स्वेदो दीपनं तन्मतं बुधैः ॥" इति प्राचीनोक्तिरत्रानुसन्धेया ॥ ६५ ॥ भा.टी.-दोलायन्त्र में क्षार अम्ल आदि औषधि द्रवों को भरकर उसमें पारद को इतना स्वेदन करें जिससे वह धातुओं का ग्रास कर सके अथवा गन्धक आदि को जीर्ण कर सके। इस क्रिया को दीपन संस्कार कहते हैं ॥६५॥ दीपनस्य प्रथमः प्रकारः काशीशं मरिचं तथैव तुवरी शोभाञ्जनं काञ्जिकं सौभाग्यं पटुपञ्चकञ्च दहनो राजी समं मेलयेत् । निक्षिप्याथ दिनद्वयं बुधवरो दोलाख्ययन्त्रे पचेत् ग्रासार्थी खलु जारणे च चतुरः सञ्जायते पारदः ॥६६॥ तत्प्रथमः प्रकारः-तुवरी स्फटिका, पटुपञ्चकं लवणपञ्चकम् , दहनश्चित्रकः, स्पष्टमन्यत् ॥ ६६ ॥ भा.टी.-दोलायन्त्र में कासीस, कालीमिर्च का चूर्ण, फिटकरी, सहजना, काञ्जी, सुहागा, पाँचों नमक, चित्रकमूलछाल, राई; सबको एकत्र मिलाकर इसमें पारदपोटली को लटका दें । इस प्रकार दो दिन तक मन्द-मन्द अग्नि से स्वेदन करने से पारद धातुओं को ग्रास तथा जीर्ण में अत्यन्त शक्तिशाली हो जाती है ॥ ६६ ॥ अथ द्वितीयः प्रकारः सौभाग्यं पटुपञ्चकञ्च मरिचं शोभाञ्जनं चासुरी काशीशं यवजोऽनलश्च तुवरी सेफालिका सर्जिका । तुल्यांशैः सुविचूर्णितैर्गृहजले यन्त्र तु दोलाह्वये स्विन्नो यामयुगं ततो रसवरो ग्रासाभिलाषी भवेत् ॥६७॥