रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगन्धः स्यादधिकः सूताद्यावान् योगेषु मानतः । गन्धं तावन्तमेवेह विधानज्ञो विनिक्षिपेत् ॥ ११० ॥ रेसोऽधिको भवेद्यत्र गन्धकस्य प्रमाणतः । आदावेव विदध्यात्तु तन्मानात्तत्र कज्जलीम् ॥१११॥ अथ कज्जलिका परिचयः—समासतस्त्रिविधा कज्जली गन्धकमानभेदात् । तत्र पारदापेक्षया अर्धगन्धका यथा-गण्डमालाखण्डनरसे— “कर्षं सूतं शुद्धमस्य गन्धकन्त्वर्धमुत्तमम्” इति । समानगन्धा यथा—स्वच्छन्दभैरवे-“शुद्धं सूतं यथा गन्धं....तुल्यांशम्मर्दयेत्” इत्यादि । द्विगुणगन्धा अर्शःकुठारे-“भागः शुद्धरसस्य भागयुगलं गन्धस्य” इत्यादि । उपलक्षणञ्चैतत्—त्रिगुणचतुर्गुणगन्धनिर्मिता- दीनामप्युपलम्भात् । यथा त्रिगुणगन्धा ज्वरघ्नीगुटिकायाम्-“भागैकं स्याद्रसा- च्छुद्धाद् द्वौ पिप्पल्यास्ततस्त्रयः ! आकारकरभाद् गन्धाद्” इति । चतुर्गु णं यथा- गुञ्जागर्भर्से-“निष्कत्रयं शुद्धसूतं निष्कद्वादशगन्धकम्” इति । क्वचित्तु पारदा- चतुर्थांशगन्धयुतापि यथा-आमवातविध्वंसनरसे-“प्रक्षिप्य गन्धं रसपादभागम्” इति । क्वचित् तृतीयांशगन्धकयुतापि यथा-हेमगर्भपोट्टल्याम्-“शुद्धसूतं त्रिभागं स्यात् तन्मानं शुल्वभस्म च । भागैकं गन्धकं दद्यात्” इति । क्वचित् “पलानि चत्वारि रसस्य गन्धस्य” इति त्रैलोक्यनाथरस इति । मसृणकाया कोमला, कज्जलरूपा पारदचाकचक्यरहिताऽतीव कृष्णा ॥ १०७-१११ ॥ भा.टी.—शुद्ध पारद में समभाग गन्धक, अथवा द्विगुणभाग या त्रिगु- णभाग, अथवा अर्धभाग शुद्ध गन्धक मिलाकर खरल में खूब मर्दन करके इसका काला चमकीला रूप बना लेना कज्जलिका कहा जाता है ॥ १०७ ॥ जिन योगों में पारद और गन्धक समभाग प्रयोग लिखा हो वहाँ पर इनकी समभाग में बनायी हुई कज्जली डाल सकते हैं। और यदि कहीं योगों में केवल पारद का ही उल्लेख किया हो तो पारद न डाल कर उसके स्थान पर रससिन्दूर का प्रयोग करना चाहिये । जिन प्रयोगों में पारद कः अपेक्षा जितना अधिक गन्धक लिखा हो वहाँ पर कज्जली के अतिरिक्त अधिक गन्धक डाल कर कज्जली बना प्रयोग करना चाहिये । इसके विपरीत जिन योगों में गन्धक की अपेक्षा पारद का भाग अधिक हो वहाँ पर पहिले ही उस पारद गन्धक को कज्जली अच्छी तरह बना लेनी चाहिये ॥ १०८-१११ ॥