रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तमस्तरङ्गः १५७ अथ पारदस्य द्वितीयो मारणप्रकारः विष्णुक्रान्ता देवदालीमारनालेन मर्दयेत् । तयोरेव द्रवेणाथ भावयेत् सप्तवारकम् ॥ १७ ॥ मूर्च्छितञ्च सुविज्ञाय पारदं खर्परे न्यसेत् । दीप्तानलायां चुल्ल्याञ्च स्थापयेदथ खर्परम् ॥ १८ ॥ वारं वारं तयोस्तत्र द्रवं शीघ्रं विनिक्षिपेत् । एवं रसो दिनैकेन समुपेति हि पञ्चताम् ॥ १९ ॥ शीघ्रं क्षेपः पारदोड्डयनरोधाय । शिष्टं सुगमम् ॥ १७–१९ ॥ भा.टी.—नील अपराजिता तथा देवदाली को काञ्जी में अच्छी तरह मर्दन करें । इन दोनों औषधियों के स्वरस या कषाय से पारद को सात भावना देवें । जब औषधि स्वरस में घोटते-घोटते पारद मूर्च्छित (कल्क में नष्ट पिष्ट ) हो जाय तो इसे एक मिट्टी के दृढ़ खर्पर में थोड़ी-थोड़ी देर बाद दोनों औषधियों का रस डालते जायँ जब तक कि खर्पर में पारद भस्म न हो जाय । इस विधि से एक ही दिन में पारद की भस्म हो जाती है ॥ १७–१९ ॥ अथ पारदमारणस्य तृतीयः प्रकारः अङ्कोलमूलसलिलैः सूतं खल्वे विमर्दयेत् । सूतमानोन्मितं गन्धं शुद्धं तत्र विनिक्षिपेत् ॥ २० ॥ संस्थाप्य सूतं मूषायां विदध्याद् वह्निमृत्स्नया । सन्धिलेपं, ततः प्राज्ञः प्रदीप्तोपलपावके ॥ २१ ॥ यन्त्रे भूधरसंज्ञे च पचेद्यामचतुष्टयम् । एवं रसेश्वरः शीघ्रं नियतं याति भस्मताम् ॥ २२ ॥ पूर्वं कज्जली कार्या पश्चादङ्कोलमूलसलिलैर्मर्दनम् ॥ २०–२२ ॥ भा.टी.—शुद्ध पारद को खरल में डालकर उसमें अंकोलमूल का स्वरस डालकर अच्छी तरह मर्दन करें, जब पारद मूर्च्छित हो जाय तो उसमें पारद समभाग शुद्ध गन्धक मिलाकर अच्छी तरह मर्दन करके सुखा लें । अब इसको मूषा में बन्द करके पूर्वोक्त वह्निमृत्स्ना से इसकी सन्धि लिप्त कर दें । अच्छी तरह सूखने के बाद इस मूषा को भूधरयन्त्र में रखकर चार पहर तक उपलों की तीव्र अग्नि देवें । इस विधि से भी पारद शीघ्र भस्म हो जाता है ॥२०–२२॥ अथ पारदमारणस्य चतुर्थः प्रकारः अपामार्गस्य बीजानि नूतनानि विचूर्णयेत् ।