भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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२६४ रसतर्ङ्गिणी रजनीद्वयमञ्जिष्ठाक्षारक्षोदान्विता शिला । घृतक्षौद्रैः प्रलेपात्तु वर्ण्या त्वग्दोषनाशिनी ॥१२३॥ पिप्पलीनागरोपेता कपित्थरससंयुता । लाजान्विता तु मधुना लीढा छर्दिं विनाशयेत् ॥१२४॥ रोगयोग्यः प्रयोगः—त्र्यूषणक्षोदः त्रिकटुचूर्णम् । कपोतगूथं कपोतविष्ठा । क्षारक्षोदः यवक्षारचूर्णम् । अथ प्रसङ्गान्मनःशिलीयो माणिक्यरसः—शुद्धवर- नागस्याष्टौ तोलकानि, हिङ्गुलोत्थपारदस्याष्टौ तोलकानि, मनःशिलायाः शुद्धाया अष्टौ तोलकानि, शुद्धगन्धस्याष्टौ तोलकानि । वरनागं वह्निगलितं पारदेन सह सम्मेल्यातिश्लक्ष्णां पिष्टिं विधाय शिलागन्धाभ्यां सावधानतया पेषयेत् । वालुका- यन्त्रे षोडश यामान् विपचितो रससिन्दूराभो भवति माणिक्यो रसः । स च नागादिसम्पर्कजातो विशेषतः कफप्रधानं राजयक्ष्माणमाद्यावस्थायां दत्तो हन्ति । मात्रा रक्तिकार्द्धपर्यन्तमिति । योगोऽयं यक्ष्मचिकित्सासु रसमाणिक्यनाम्ना व्यवहृतः पूर्वैरिति ॥ ११८–१२४ ॥ भा.टी.—शुद्ध मैनसिल में त्रिकटुचूर्णा मिला वासास्वरस के साथ सेवन करने से कास-श्वास रोग में लाभ होता है । विषमज्वरों के वेग को रोकने के लिये मैनसिल में पिप्पलीचूर्ण मिला जल से पीसकर आंखों में अञ्जन किया जाता है । त्रिदोषप्रकोपजन्य ज्वरों को दूर करने के लिये मैनसिल में पिप्पली तथा निम्बबीजचूर्ण मिला करेले के पत्रस्वरस से गोली बनाकर प्रयोग किया जाता है । सेन्धानमक एक भाग, कालीमिर्च चूर्ण दो भाग, मैनसिल तीन भाग, शंखभस्म चार भाग लेकर, इनका बारीक चूर्ण करके अञ्जन बना लें, इसको आँखों में लगाने से नेत्र रोग नष्ट होते हैं । अपस्मार रोग में मैनसिल, रसौंत तथा कबूतर की विष्ठा, इनका अञ्जन बनाकर आंखों में लगाने से आराम आता है । त्वक् रोगों या त्वचा की खराबी में मैनसिल में हरिद्रा, मञ्जिष्ठाचूर्ण और यवक्षार मिला घी और शहद के साथ शरीर में लेप करने से आराम आता है । वमन रोकने के लिये मैनसिल को पिप्पली और सोंठ चूर्ण, और धान का लावा में मिलाकर कैथ के स्वरस तथा मधु के साथ चटाया जाता है ॥ ११८–१२४ ॥ अशुद्धमनःशिलाविकारे भेषज्यम् शिलाविकारोपहतः पिवेत्क्षीरं दिनत्रयम् । मधुना पथ्यसंयुक्तो वान्त्यादिभ्यो विमुच्यते ॥१२५॥