भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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द्वादशस्तरङ्गः २८५ भा.टी.—बल, काल आदि के अनुसार गोदन्तभस्म की मात्रा एक रत्ती से लेकर तीन रत्ती तक दी जा सकती है ॥ २४२ ॥ यह तालकादिविज्ञानीय नाम एकादशतरङ्ग समाप्त हुआ । अथ शंखादिविज्ञानीयो नाम द्वादशस्तरङ्गः । अथ शंखस्य नामानि शंखस्तु शंखकः कम्बुस्त्रिरेखश्च समुद्रजः । सुनादो दीर्घनादश्च कम्बोजश्च प्रकीर्तितः ॥१॥ भा.टी. -शंख, शंखक, कम्बु, त्रिरेख, समुद्रज, सुनाद, दीर्घनाद, कंबोज ये सब नाम शंख के समझने चाहिये ॥ १ ॥ ग्राह्यशंखस्य स्वरूपम् वृत्तः स्निग्धः सूक्ष्ममुखो निर्मलश्चेन्दुसुन्दरः । दीर्घकायो गुरुश्चापि शङ्खः श्रेष्ठः प्रकीर्तितः ॥२॥ भा.टी.—गोलाकार, चिकना स्पर्श, सूक्ष्म मुख, स्वच्छ चन्द्रमा सदृश सुन्दर, बृहत् आकार और गुरुभार शंख औषधिकर्म में ग्राह्य समझना चाहिये ॥ २ ॥ शंखस्य द्वौ भेदौ शङ्खस्तु द्विविधः प्रोक्तो रसतन्त्रविचक्षणैः । प्रथमो दक्षिणावर्तो वामावर्तोऽपरो मतः ॥३॥ दक्षिणावर्तशङ्खस्तु प्रशस्तो देवपूजने । त्रिदोषघ्नो निधिश्वापि स्मृतो दारिद्र्यनाशनः ॥४॥ वामावर्ताभिधः शङ्खः सर्वत्र सुलभो मतः । अतः स एव वैद्यैस्तु मारणार्थं प्रयुज्यते ॥५॥ शंखस्य नामस्वरूपभेदोपयोगाः स्पष्टप्रायाः ॥ ३-५ ॥ भा.टी.—रसशास्त्रज्ञों ने शंख के दो भेद माने हैं । १—दक्षिणावर्तशंख, २—वामावर्तशंख । इनमें से दक्षिणावर्तशंख देवताओं की पूजा में काम आता है । यह त्रिदोषनाशक और दरिद्रता को दूर करनेवाली एक निधि (विशेष बहुमूल्य पदार्थ) मानी जाती है । वामावर्तशंख प्रायः सर्वत्र सुलभ होता है । अतः इसी को ही वैद्य लोग भस्म करने के काम में लाते हैं ॥ ३–५ ॥ अथ शंखस्य प्रथमः शोधनप्रकारः शङ्खन्तु खण्डशः कृत्वा पोट्टल्यां स्थापयेद्भिषक् । दोलायन्त्रे चतुर्यामं पचेज्जम्बीरवारिणा ॥६॥