भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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३१६ रसतरङ्गिणी पात्रे काचप्रलिप्ते तु मेलयेदुभयोर्द्रवम् । मृद्वग्निना चुल्लिकायां पचेत्तोयञ्च शोषयेत् ॥६०॥ निःशेषं सलिलं ज्ञात्वा शुभ्रं चूर्णं समाहरेत् । भिषग्वरैः समाख्याता निम्बूकाम्लीयसर्जिका ॥६१॥ निम्बूकाम्लीयसर्जिकास्तत्र च सर्जिक्षारस्य ४१ भागाः, जलस्य ८२ भागाः, निम्बूकाम्लस्य २० भागाः, जलस्य २० भागाः । पृथक्-पृथक् द्रावयित्वा पश्चादु- भयोर्मेलनं विधाय वह्नौ पाचनीयम् ॥५८-६१॥ भा. टी.—इकतालीस भाग सज्जीखार लेकर उसे द्विगुण शीतल जल में डाल कर घोल लें । अब एक दूसरे पात्र में बीस भाग निम्बूकाम्ल- लेकर उसको भी समभाग जल अर्थात् बीस भाग शीतल जल में घोल लें । अब इन दोनों घोलों को एक काँच के पात्र में मिलाकर अग्नि पर रखकर जलीयांश को सुखा दें । जल सूखने पर पात्र के तल में सफेद चूर्ण रह जायगा । इसी को रसायनशास्त्रज्ञ निम्बूकाम्लीय सर्जिक ( Potacium citres ) कहते हैं ॥५८-६१॥ निम्बूकाम्लीयसर्जिकाया गुणाः क्षारच्छर्दिप्रशमनी वह्निमान्द्यापहारिणी । आध्मानशूलविष्टम्भहारिणी कान्तिकारिणी ॥६२॥ ग्राहिणी शिशिरा चैव विशेषाद् दुग्धपाचनी । पिपासानाशिनी चेयं निम्बूकाम्लीयसर्जिका ॥६३॥ भा.टी.-निम्बूकाम्लीय सर्जिका, दुग्धवमन को रोकती है और अग्निमान्द्य को हटाती है । उदराध्मान, शूल तथा कब्ज को नष्ट करती है और शरीर की कान्ति को बढ़ाती है । यह ग्राही ( स्रावरोधक ) तथा बाह्य स्पर्श में शीत गुण होती है । यह दूध को पचाने में विशेष रूप से काम आती है । इसके प्रयोग से अधिक तृष्णा भी शान्त हो जाती है ॥६२-६३॥ अस्या बालकोचिता मात्रा गुञ्जैकतः समारभ्य गुञ्जाद्वितयसंमिताम् । प्राणाचार्यः प्रयुञ्जीत निम्बूकाम्लीयसर्जिकाम् ॥६४॥ पूर्णमात्रा आरभ्य पञ्चगुञ्जातो दसगुञ्जोन्मितां परम् । रसविद्विनियुञ्जीत निम्बूकाम्लीयसर्ज्रिकाम् ॥६५॥

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