रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२४ रसतरङ्गिणी ( विचर्चिका ) और अग्निदग्धव्रण तथा अन्यान्य व्रणों के लिए अधिक उपयोगी होता है ॥१०८-१११॥ टङ्काम्लस्य मलहरः सिक्थतैलं सुविमलं ग्रहतोलकसंमितम् । तोलकैकमितं चैव टङ्काम्लकमूत्तमम् ॥ ११२ ॥ सम्मेल्य खल्वे यत्नेन काचकूप्यां तु विन्यसेत् । मतो मलहरोऽयं तु टङ्काम्लसमाह्वयः ॥ ११३ ॥ अस्य गुणाः टंकाम्लीयो मलहरो विशेषाद् व्रणशोधनः । अग्निदग्धव्रणहरो भूतघ्नश्च परं स्मृतः ॥ ११४ ॥ ग्रहाः नव, तस्मात् नवतोलकसंमितम् ॥११२-११४॥ भा. टी.—स्वच्छ सिक्थतैल नौ तोला, उत्तम टंकणाम्ल एक तोला, इन दोनों को एकत्र अच्छी तरह मिलाकर काँच की शीशी में रख लें ! इसको टंकणाम्ल मलहर कहा जाता है। बोरिक एसिड (टंकणाम्ल) का मरहम व्रणशोधनार्थ विशेष रूप से प्रयुक्त होता है। इसके अतिरिक्त यह मरहम अग्निदग्ध व्रणों के लिए उत्तम और उत्तम जीवाणुहर है ॥११२-११४॥ टङ्काम्लद्रवस्य निर्माणप्रकारः दशगुञ्जापरिमितं टंकणाम्लं समाहरेत् । क्षिपेत् परिश्रुते तोये पञ्चतोलकसंमिते ॥ ११५ ॥ विद्रुतं सपिधानायां काचकूप्यां तु विन्यसेत् । टंकणाम्लद्रवोऽयं तु नाम्ना ख्यातो भिषग्वरैः ॥ ११६ ॥ भा.टी.—दस रत्ती परिमाण टंकणाम्ल लेकर इसको पाँच तोले परिश्रुत जल ( Distilled water ) में डालकर घोल लें। अच्छी तरह घुल जाने पर इसको एक अच्छी और पक्के डाटवाली काँच की शीशी में रख लें । इसको वैद्य लोग टंकणाम्ल-द्रव नाम से व्यवहार में लाते हैं ॥११५-११६॥ अस्य आमयिकः प्रयोगः टंकणाम्लद्रवोऽयं तु क्षालने विनियोजितः । विनाशयेच्चिरोद्भूतं नेत्राभिष्यन्दमुद्धतम् ॥ ११७ ॥ उक्तमानकृतेनैव टंकणाम्लद्रवेण तु प्रत्यहं विधिना दद्यात् बस्तिमुत्तरपूर्विका म् ॥ ११८ ॥