भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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३३० रसतरङ्गिणी अधिक मात्रा में खाने से वमनकारक और सारक (पतला, अधिक मात्रा में दस्त लानेवाला), फेफड़ों में होनेवाली शोथ को मिटाता है। इसके प्रयोग से अग्नि दीप्त होती है और पाचक रस अधिक उत्पन्न होता है। इसको सुँघाने से मूर्छा दूर हो जाती है ॥ २२, २३ ॥ वक्तव्य-नौसादरसत्त्व केवल फेफड़ों की शोथ को ही नहीं बल्कि प्रायः सभी स्थानिक शोथों में बाह्य प्रयोग से लाभ करता है, क्योंकि इसके लगाने से उस स्थान पर रक्त अधिक मात्रा में आ जाता है जिससे वहाँ की शोथ शूल शान्त हो जाते हैं। नौसादरसत्त्व के प्रयोग से आमाशय की वातनाड़ियाँ सहसा उत्तेजित हो जाती हैं जिससे सम्पूर्ण शरीर की नाड़ियों में भी उत्तेजना आ जाती है और रोगी अपने को बलवान् पाता है। अतः यह सर्वाङ्गबल्य और उत्तेजक माना जाता है। ज्वर के प्रारम्भ में स्वेद और मूत्र को लाने के लिये अमोनिया के योग दिये जाते हैं। अस्य मात्रा गुञ्जैकतः समारभ्य गुञ्जापञ्चकसंमितम् । नवसादरसत्त्वस्य मात्रा शस्ता भिषग्वरैः ॥ २४ ॥ सपादमाषकमिता मात्रा वमनकारिणी । नवसादरसत्त्वस्य भिषग्भिः परिकीर्तिता ॥ २५ ॥ मात्रायान्तु विशेषः-सपादमाषकमिता दशगुञ्जारूपा । सलिले द्रावयित्वास्य प्रयोगः पानादौ ॥ २४, २५ ॥ भा.टी.-वैद्यों ने साधारणतः प्रयोग करने के लिए नौसादरसत्व की मात्रा एक रत्ती से लेकर पाँच रत्ती तक निश्चित की है नौसादरसत्व को सवा मासा मात्र में खाने से वमन होने लगती है। इसी तरह अधिक मात्रा में खाने पर कई बार वमन और रेचन दोनों होने लगते हैं ॥ २४, २५ ॥ अथ सत्त्वस्य प्रयोगविधि नव्यसारभवं सत्त्वं सलिले तु परिस्रुते । द्रावयित्वाऽथ निर्दिष्टरोगेषु तु नियोजयेत् ॥ २६ ॥ भा.टो.-नौसादर के उक्त प्रकार से प्राप्त सत्त्व को शुद्धपरिस्रुत जल में घोलकर आवश्यकतानुसार तत्तद् रोगों में प्रयोग करना चाहिये ॥ २६ ॥ अथ सोरकस्य नामानि सोरकः सोरकश्चैव सोरा सैवेह सोरका । सूर्यक्षारोऽथ मृत्क्षारो वह्निचारश्च कीर्तितः ॥ २७ ॥