रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३३८ रसतरङ्गिणी वक्तव्य—क्षार, लकड़ियों के अतिरिक्त डंठलों और पुष्पों या पञ्चांग- युक्त वनस्पतियों के भी बनाये जाते हैं। जैसे तिल और जौ की डंठलों का, ताड़ और नारियल के पुष्पों का, अपामार्ग आदि के पञ्चांग का क्षार बनाया जाता है। यहाँ पर 'काष्ठ' शब्द साधारण अथवा उपलक्षण समझना चाहिये। क्षारनिर्माण में कहीं राख से आठ गुना जल लेने को भी कहा जाता है, कोई क्षारजल को इक्कीस बार वस्त्र से छानने को कहते हैं। और कई वैद्य राख में चतुर्गुणजल डालकर खूब मसलकर इसको बारह या चौबीस घंटे निश्चलरूप में रखने के बाद ऊपर आये हुए स्वच्छ जल को छानकर पकाने को कहते हैं। सारांश यह है कि छानने में जितना ही अधिक सावधानी स्वच्छ जल के विषय में की जायगी उतना ही स्वच्छ और सफेद वर्ण का क्षार प्राप्त होगा। सामान्येन क्षाराणां गुणाः क्षारास्तीक्ष्णा महोष्णाश्च दाहकर्मकराः परम्। गुल्मार्शोग्रहणीप्लीहमूत्रकृच्छ्राश्मरीहराः ॥ ६२ ॥ कृमिघ्नाः पाचनाश्र्चैव दारणाश्च विसर्पिणः। शोधना रोपणाश्चैव मूत्रलाश्र्च प्रकीर्तिताः ॥ ६३ ॥ सामान्यतः क्षारगुणवर्णनम्—दारणाः विद्रध्यादेः, विसर्पिणो व्याप्तिशीलाः ॥ ६२, ६३ ॥ भा.टी.—प्रायः सभी क्षार सामान्यतः तीक्ष्ण, अत्यन्त उष्णवीर्य और कोमल त्वचा, मांस तथा कलाओं को जलानेवाले होते हैं। क्षार से गुल्म, अर्श, ग्रहणीरोग, प्लीहावृद्धि, मूत्रकृच्छ्र तथा अश्मरीरोग नष्ट होते हैं। इनके प्रयोग से उदरकृमि तथा बाह्य दोनों प्रकार के कृमि नष्ट होते हैं। अन्तःप्रयोग में इनसे पाचक रस अधिक उत्पन्न होता है। बाह्य प्रयोग में इनसे व्रणशोथ पक जाता है। यह व्रण विद्रधि आदि में लगाने से वे फट जाते हैं। क्षार विसर्पी अर्थात् व्रणों को शुद्ध करने और उनको भरने के कार्य में भी आते हैं। उनके सेवन से वृक्कक्रिया उत्तेजित होने से मूत्र अधिक आता है, अतः क्षार मूत्रल भी होते हैं ॥ ६२, ६३ ॥ सामान्येन क्षाराणां मात्रा द्विगुञ्जातः समारभ्य रक्तिकाष्टकसंमितान्। क्षारास्तु विनियुंजीत साधारणतया भिषक् ॥ ६४ ॥