रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषोडशस्तरङ्गः ३६१ तृतीयः प्रकारस्तालकच्छेपरहितः प्रायश्चतुर्दशपुटैः साध्यश्चेति ॥ २६-२८ ॥ भा.टी.—चांदी के बहुत पतले-पतले पत्र लेकर उनको कैंची से काटकर बहुत सूक्ष्म कणों के रूप में बनालें। अब इन कणों में चाँदी के बराबर भाग शुद्ध पारा और शुद्ध गन्धक मिला घीकुआर के गूदे में अच्छी तरह मर्दन करके शरावसम्पुट में बन्द करलें। सम्पुट के सूखने पर लघुपुट में (उपलों की अग्नि में) फूँक देवें। इस प्रकार भी थोड़े पुटों में रजत की भस्म हो जाती है ॥२६-२८॥ चतुर्थो मारणप्रकारः पत्रीकृतं शुद्धतारं चतुस्तोलकसंमितम् । द्वितोलकमितं चैव सुमृतं स्वर्णमाक्षिकम् ॥२६॥ सुधादुग्धेन सम्पेष्य पेषयेद्याममात्रकम् । आतपे चाथ संशोष्य श्लक्ष्णचूर्णञ्च कारयेत् ॥३०॥ शरावसम्पुटस्थञ्च पुटेद्वन्योपलैर्भिषक् । एवं स्वल्पपुटैरेव रजतं मृत्तिमाप्नुयात् । ३१॥ द्वितीयादिपुटेष्वत्र रसतन्त्रविचक्षणः । माक्षिकं न प्रयुञ्जीत रहस्यमिति कीर्तितम् ॥३२॥ चतुर्थः प्रकारो माक्षिकभस्मयोगो क्षुधावर्धकः उदरविकारहरश्च विशेषात्॥२६-३२॥ भा.टी.—चार तोला शुद्ध रजत को लेकर उनको कैंची से काटकर छोटे- छोटे टुकड़े करलें, अब इनमें दो तोला स्वर्णमाक्षिकभस्म मिला थोहर के दूध के साथ छः घंटे तक अच्छी तरह रगड़ करके धूप में सुखा लें। धूप में सूखने पर इसका चूर्ण-सा कर लें। अब इस चूर्ण को शरावसम्पुट में बन्द करके जंगली उपलों की अग्नि में फूँक दें। इस प्रकार थोड़े से पुटों में ही चाँदी की भस्म हो जाती है। इस विधि से रजतभस्म बनाने में पहिले पुट में ही स्वर्ण- माक्षिक डालनी चाहिये। इसके बाद केवल थोहर के दूध में ही घोटकर लघु- पुट देने चाहिये ॥ २६-३२ ॥ वक्तव्य—प्रथम बार मिलायी हुई स्वर्णमाक्षिकभस्म धीरे २ पुट देने में कुछ उड़ जाती है और कुछ दग्ध हो जाती है और कुछ अंश रजतभस्म में भी रह जाती है। इस विधि से बनायी हुई रजतभस्म उदररोगहर और क्षुधा- वर्धक होती है। क्योंकि इसमें थोहर का दूध पर्याप्त मात्रा में पड़ता है। पञ्चमो मारणप्रकारः शुद्धानि तारपत्राणि समादाय भिषग्वरः ।