रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४५२ रसतरङ्गिणी अस्य गुणा:—शिशिरं गन्धमारितमपि क्षारसंयोगात् शीतवीर्यम्। लवणं सङ्घारत्वात्। नेत्र्यं प्रदिष्टं कैश्चित् ॥ ८१, ८२ ॥ भा.टी.—स्वर्णवंग शीतवीर्य शीतगुण, रूक्ष, सर, तिक्त, लवण और अम्ल- रस होता है। यह सब शरीर को बल देने के कारण रसायन, प्रमेहहर, बुद्धि- वर्धक, बल्य और नेत्रों के लिये परम लाभदायक है। इसको कुछ काल सेवन करने से शारीरिक शोभा बढ़ जाती है और भूख लगने लगती है। ऊर्ध्वजत्रु तथा श्वास नली आदि स्थानों में होनेवाले कफप्रकोपजन्य रोग दूर होते हैं और उत्पादक अंगों के लिए उत्तम बल्य (वृष्य) है। इसके सेवन से मेदो- विकार नष्ट हो जाते हैं और शरीर में शुक्र धातु की उत्पत्ति होती है॥८१, ८२॥ अस्य मात्रानिरूपणम् गुञ्जैकतः समारभ्य गुञ्जा द्वितयसंमितम् । सुवर्णवंगं युञ्जीत बलकालाद्यपेक्षया ॥ ८३ ॥ मात्रादिकं वंगभस्मवत् सर्वम् ॥ ८३ ॥ भा.टी.—रोग तथा रोगी का बल तथा काल आयु आदि का विचार करके एक रत्ती से दो रत्ती तक मात्रा में स्वर्णवंग का सेवन किया जा सकता है ॥८३॥ अस्य आमयिकः प्रयोगः स्वर्णवंगं विशेषेण वंगोक्तेरनुपानकैः । तत्तद्रोगेषु नियतं प्रयुंजीत भिषग्वरः ॥ ८४ ॥ [ गीतिका ] बहुलारजोविमिश्रं त्वपि नागकेसराह्वयम् । यशदोत्थभूतियुक्तं सुविभं सुवर्णवंगम् ॥ ८५ ॥ परिशीलितं सपथ्यं दिनसप्तकं प्रयत्नान् । विनिवारयेद्धि शुक्लप्रदरोत्थितां तु बाधाम् ॥ ८६ ॥ परिशीलितं तथेदं खलु मासमात्रयोगात् । विनिहन्ति शुक्रमेहं सुचिरोत्थितं प्रकामम् ॥ ८७ ॥ सममाधवोचिताढ्यं सुविभं सुवर्णवंगम । परिशीलितं द्विगुञ्जं व्रणमेहहत्प्रदिष्टम् ॥ ८८ ॥ मधुना सुवर्णवंगं रजनीरप्रगाढम् । अशितं ह्यमोघशस्त्रं व्रणमेहनाशनाय ॥ ८६ ॥