रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकोनविंशस्तरङ्गः ४७५ अशुद्धं यशदं गुल्मादीन् जनयतीति तस्माच्छोध्यम् ॥ ६७ ॥ भा.टी.—बिना शुद्ध किये यशदभस्म का सेवन किया जाय अथवा शुद्ध करके पूर्ण रूप से उसकी भस्म किये बिना ही सेवन किया जाय तो उससे गुल्म, प्रमेह, क्षय, कुष्ठ आदि विकार उत्पन्न हो जाते हैं ॥ ६७ ॥ यशदस्य प्रथमः शोधनप्रकारः जात्यं यशदमादाय लोहदर्व्यान्तु विन्यसेत् । तीव्राग्निना तु विद्राव्य चूर्णवारिप्रपूरिते ॥ ६८ ॥ सच्छिद्रेण पिधानेन पिहितास्ये घटे क्षिपेत् । सप्तवारं प्रयत्नेन यशद् शुद्धिमाप्नुयात् ॥ ६९ ॥ यशदशोधनं चूर्णवारिणि सप्तधा निर्वापणाद् भवति प्रथमम् ॥ ६८, ६९॥ भा.टी.—उत्तम यशद को लोहे की करछी में डाल तीव्र अग्नि के ऊपर रखकर पिघलायें। जब यशद अच्छी तरह पिघल जाय तो उसे चूने के जल से भरे हुए और मुख पर एक छिद्रयुक्त शराव रखे हुए पात्र में शराव छिद्र से चूने के जल में बुझा दें। इस प्रकार सात बार गरम करके चूने के जल में बुझाने से यशद शुद्ध हो जाता है ॥ ६८, ६९ ॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः यशदं द्रावितं यत्नात् सप्तवारं विधानतः । सिन्दुवारशिफाद्रावे स्नपयेद्भिषजां वरः ॥ १०० ॥ रीत्यानया तु यशदं शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् । एवं शुद्धन्तु यशदं मारणाय प्रयोजयेत् ॥ १०१ ॥ अथवा सप्तवारं निर्गुण्डीमूलरसे निर्वापणेन शुद्धिः ॥ १००, १०१॥ भा.टी.—यशद को करछी में पिघलाकर सावधनी के साथ उक्तविधि से निर्गुण्डीमूलस्वरस में सात बार बुझा दें। इस प्रकार यशद उत्तम रूप से शुद्ध हो जाता है और इसको भस्म करने के काम में लाना चाहिये ॥१००, १०१॥ वक्तव्य—प्राचीन ग्रन्थों में यशद का शोधन-मारण वंग के सदृश ही लिखा है, परन्तु यहाँ पर लिखी हुई विधि से शोधन करने पर इसमें किसी प्रकार का दोष रहने का सन्देह नहीं रहता है। तृतीयः शोधनप्रकारः यशदं द्रावितं यत्नाद् गोदुग्धे स्नपयेद्भिषक् । त्रिसप्तवारं यत्नेन यशदं शुद्धिमाप्नुयात् ॥ १०२ ॥