भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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विंशस्तरङ्गः ५०७ दत्त्वा कन्याम्भसा पिष्ट्वा शुष्कचूर्णांश्च कारयेत् ॥ ८० ॥ सम्पुटेऽस्थं ततः कृत्वा पुटेद् गजपुटे भृशम् । इत्थमेकपुटेनैव भवेल्लोहं निरुत्थितम् ॥ ८१ ॥ भा.टी.--उक्त विधियों में से किसी विधि द्वारा बनायी लोहभस्म में गोघृत और शुद्ध गन्धक समभाग मिला कन्यास्वरस से अच्छी तरह घोंटकर शुष्क चूर्ण बना लें । अब चूर्ण को एक शरावसम्पुट में बन्द करके गजपुट में फूँक देवें । इस प्रकार एक ही गजपुट देने से लोहभस्म निरुत्थित हो जाती है ॥८०, ८१॥ निरुत्थीकृतलौहस्य परीक्षणम् विविधांविहितं वै त्वायसं तीक्ष्णकान्तं घृतमधुपुरगुञ्जाटङ्कणक्षोदयुक्तम् । सुपुटितमनलस्थं चेन्नयत्यात्मभावं भवति सुमृतमेतत्सर्वयोगोपयुक्तम् ॥ ८२ ॥ भा.टी.-उक्त लौहमारण विधियों में से किसी विधि द्वारा बनायी लौह- भस्म ( तीक्ष्णभस्म या कान्तभस्म ) को घृत, मधु, गुग्गुलु, गुञ्जा ( रत्ती ) और टंकणचूर्ण में मिलाकर सम्पुट में बन्द कर पुट में फूँक देवें । यदि इस प्रकार मित्रपञ्चक के साथ पुट देने से वह ज्यों की त्यों भस्म रूप में ही बनी रहे तो समझना चाहिये कि यह लौहभस्म निरुत्थ है और सर्व योगों में काम आ सकती है । और यदि पुट देने पर लोहभस्म का लोहखण्ड या पिण्ड-सा बन जाय तो उसे अशुद्ध या अमृत लौहभस्म समझना चाहिये ॥ ८२ ॥ अथ मृतलौहस्य गुणाः लौहं रूक्षं सुमधुरमलं पाकतश्चाथ तिक्त. वीर्ये शीतं गुरु च तुवरं लेखनञ्चातिनेत्र्यम् । बल्यं वृष्यं जठरगदनुत् श्लेष्मपित्तामयघ्नं वय्यं मेध्यं खलु किमधिकं हन्ति नानामयौघम् ॥ ८३॥ मृतलौहगुणाः-रूक्षं रूक्षणोपयोगि मेदोहरत्वादित्यर्थः, सुमधुरं विपाके, तिक्तं तुवरं कषायमिति च रसे ॥ ८३ ॥ भा.टी.-लौहभस्म रूक्ष ( मेद और कफविकारों में चर्बी और कफ को खुश्क करनेवाली ) मधुर विपाक तिक्तकषाय रस है । वीर्य में शीत, गुणों में गुरु और लेखन होती है। यह नेत्रज्योति के लिये उत्तम, शारीरिक तथा उत्पादक अंगों के लिये बल्य, उदररोगनाशक, कफपित्तप्रकोपनाशक, त्वग्रोगहर और