रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकविंशस्तरङ्गः ५३६ भा.टी.—उक्त तुत्थ मलहर का कुछ दिन पामा पर लेप करने से पुरानी पामा भी नष्ट हो जाती है ॥६६॥ तुत्थकाद्यो मलहरः घृतं द्वितोलकमितं दर्वीस्थं वह्निना पचेत् । तोलकादष्टमांशं वा पादिकं रालकं क्षिपेत् ॥१००॥ रालन्तु विद्रुतं ज्ञात्वा द्रुतं खल्वे विनिक्षिपेत् । दत्त्वाथ निर्मलं तुत्थं तोलकस्याष्टमांशिकम् ॥१०१॥ खटीं कपर्दभसितं टङ्कणैकैकतोलकम् । पेषयेद्वारिणा तावन्मुञ्चेत्रीरन्तु नीलताम् ॥१०२॥ मुहुर्मुहुः क्षिपेन्नींरं मर्दनान्नीलतां गतम् । विशालास्ये काचकूपे निदध्यादथ यत्नतः ॥१०३॥ तुत्थकाद्यो मलहरो व्रणसंशोधनः परम् । पूयनिःसारकश्चैव विविधव्रणनाशनः ॥१०४॥ भा.टी.—दो तोले घी को एक चम्मच में लेकर अग्नि में गरम करें। जब घी गरम हो जाय तो उसमें तोले का आठवाँ अथवा चौथाई भाग राल का चूर्ण डाल दें। जब राल घी में पिघल जाय तो शीघ्र नीचे उतार इसको खरल में डाल दें। और इसमें तोले का आठवाँ भाग अर्थात् डेढ़ मासा साफ तूतियाचूर्ण खडिया, कौड़ी की भस्म तथा सुहागाचूर्ण एक-एक तोला डाल दें। अब इसको खूब मर्दन करें और जल डालते जायँ। इस तरह तब तक करें जब तक कि इसमें से नीला पानी निकलता रहे। स्वच्छ जल निकलने पर इसको काँच की चौड़े मुख की शीशी में रख लें। यह तुत्थकादि मलहर उत्तम व्रण शोधक पूयनिःसारक तथा विविध प्रकार के व्रणों को नष्ट करता है ॥१००-१०४॥ विशुद्धतुत्थकस्य प्रयोगः सौभाग्यपुष्पसंयुक्तं तुत्थकं त्वार्द्रकाम्भसा । द्विगुञ्जं वमने दद्यात्संज्ञालोपापनुत्तये ॥१०५॥ भा.टी.—दो रत्ती शुद्ध तूतिया और दो रत्ती सुहागा का लावा को अद- रख रस के साथ देने से वमन होकर बेहोशी दूर हो जाती है ॥१०५॥