भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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६१८ रसतरङ्गिणी भा.टी.—जो पुखराज श्यामलवर्ण, प्रभारहित, स्पर्शरहित, स्पर्श में कठोर, दो नेत्रों के से चिह्नोंवाला अथवा छोटे-छोटे काले बिन्दुओं से युक्त, बालू के पिण्ड जैसा, कहीं ऊँचा, कहीं पर गहरा और रूक्ष ( खुश्क ) हो, उसे त्याज्य समझना चाहिएं ॥ ६० ॥ पुष्पराजस्य शोधनम् कुलत्थक्वथितोपेतेः काञ्जिकैः स्वेदितं समम् । दोलायन्त्रे पुष्पराजं यामैकेन विशुद्ध्यति ॥ ६१ ॥ शोधनम्—कुलत्थकथितजलेन काञ्जिकेन च स्वेदनादस्य शुद्धिः—“पुष्प- रागञ्च संधानैः कुलत्थक्वाथसंयुक्तैः” इति वचनात् ॥ ६१ ॥ भा.टी.—दोलायन्त्र में समभाग कुलत्थक्वाथ और काञ्जी डालकर उसमें तीन घण्टे तक पुखराज को स्वेदन करने से वह शुद्ध हो जाता है ॥ ६१ ॥ पुष्पराजस्य मारणम् माणिक्यमारणोद्दिष्टविधिभ्यामतिर्यत्नतः । मारयेत्पुष्पराजन्तु रसतन्त्रविचक्षणः ॥ ६२ ॥ भा.टी.—पूर्व कथित माणिक्यमणि का दो प्रकार की मारण विधियों से पुखराज की भस्म हो जाती है । अर्थात् पुखराज की भस्म विधि भी माणि- क्यमणि के सदृश ही समझनी चाहिए ॥ ६२ ॥ पुष्पराजस्य गुणाः पुष्पराजन्तु शिशिरं दीपनं पाचनं परम् । कफवातप्रशमनं कुष्ठच्छर्दिनिबर्हणम् ॥ ६३ ॥ विषघ्नं दाहशमनं गुदजामयनाशनम् । मेध्यं बृंहणमायुष्यं रसज्ञैः परिकीर्तितम् ॥ ६४ ॥ भा.टी.—पुखराज शीत गुण द्रव्य है । इसके भस्म के सेवन से दीपन और पाचन क्रियायें बढ़ने लगती हैं । इसके प्रयोग से कफ वात का प्रकोप शान्त हो जाता है । यह कुष्ठ तथा वमन को नष्ट करती है, शरीरगत विष- प्रभाव को नष्ट करती है, दाह को शान्त करती तथा बवासीर में लाभ पहुँचाती है । स्वस्थ शरीर में इसका प्रयोग करने से इसके द्वारा मेधा वृद्धि, शरीर में मांस वृद्धि तथा आयु वृद्धि होती है ॥ ६३, ६४ ॥ पुष्पराजस्य मात्रा आरभ्य गुञ्जापादांशाद् गुञ्जैकप्रमितं परम् ।