भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished799 पृष्ठ

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चतुर्विंशस्तरङ्गः ६५६ दिया जाय तो यह हृदय को बल देता है, जिससे निर्बल और तीव्र नाड़ी बल- वती और मन्द हो जाती है। परन्तु यदि अधिक मात्रा में दिया जावे तो वह हृदय को निर्बल कर देता है जिससे नाड़ी की प्रतिमिनट संख्या तथा शक्ति कम हो जाती है। साधारण मात्रा में यह श्वास-संस्थान को उत्तेजित करता है जिससे श्वास गहरा तीव्र हो जाता है। अधिक मात्रा में देने से श्वास मन्द हो जाता है। इसके अन्तःप्रयोग से भी स्वेद आता है। हृदय को मन्द करने तथा स्वेदक होने के कारण ज्वर की अवस्था में शरीर के बढ़े हुए तापमान को घटाता है। यह शरीर की संज्ञा-वाहिनियों के शिरों को थोड़े काल के लिये उत्तेजित कर फिर मन्द कर देता है जिससे शरीर के किसी भाग में शूल हो तो मिट जाती है। इसकी विषैली मात्रा खाये जाने के कुछ मिनट बाद मुख, गलप्रणाली और आमाशय में दाह वमन होती है और त्वचा पर अधिक स्वेद आता है, एवं त्वचा की संज्ञा पड़ जाती है। मंद नाड़ी निर्बल मन्द और विषम हो जाती है। पुतलियाँ फैल जातीं श्वास कठिन हो जाता और रोगी अत्यन्त निर्बल होकर मूर्च्छित हो जाता है और मूर्च्छा के बाद मृत्यु हो जाती है। किन्तु रोगी की चेतना मृत्यु तक भी बनी रहती है। उक्त विषैले लक्षणों के होने पर शीघ्र रोगी को वमन करा देना चाहिये और हृदय को सबल करने के लिये उत्तेजक औषधियाँ देनी चाहिए। हाथ और पैरों को गरम रखें और सारे शरीर को अच्छी तरह मलें। कस्तूरी वारुणी- सार, विषमुष्टि वारुणीसार, मिलाकर मकरध्वज देना चाहिए। विषप्रयोगस्य निषेधः न बालेष्वतिवृद्धेषु रोगिणीगर्भिणीषु च । न चातिक्षीणगात्रेषु यदमलद्दमयुते न च ॥६१॥ न क्रोधिते न च श्रान्ते हृद्दौर्बल्ये विशेषतः। वत्सनाभविषं वैद्यः प्रायशो न प्रयोजयेत् ॥६२॥ एतेष्वपि प्रयोक्तव्येऽवश्यं खलु विधानवित् । यत्नतोह्यल्पकालार्थं युञ्जीतात्यल्पमात्रया ॥६३॥ न बालेष्वतिवृद्धेष्विति विषप्रयोगनिषेधः तीक्ष्णवीर्यत्वात् हृदयावसादक- त्वाच्च वत्सनाभस्य। अत्र चापि प्रयोगावश्यकता चेद् अत्यल्पकालमात्रोऽस्य प्रयोगो निरापद इति ॥६१-६३॥