भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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चतुर्विंशस्तरङ्गः ६६३ एकत्र खरल में जल के साथ मर्दन करके गोली बनाने योग्य हो जाने पर डेढ़ जौ के बराबर अर्थात् आधी रत्ती की गोली बना लें। इसको हिंगुलेश्वर रस कहते हैं। यह रस आमवात शामक और वातज्वरहर है ॥ ७८, ७६ ॥ हिंगुलेश्वरस्य आमयिकः प्रयोगः तीव्रज्वरं साङ्गमर्दं सन्धिशूलसमन्वितम् । आमवातं निहन्त्याशु शीलितो हिङ्गुलेश्वरः ॥ ८० ॥ शीतकम्पाङ्गमर्दाढ्यं शिरोवेदनयान्वितम् । रसोऽयं शीलितो हन्ति वातिकज्वरमुल्बणम् ॥ ८१ ॥ नवज्वरायमाणान्तु जीर्णज्वरमथापि वा । सविरामज्वरं हन्ति रसोऽयं परिशीलितः ॥ ८२ ॥ सविरामज्वरमिति विरम्य पुनर्वेगोदये जनिशीलम् ॥ ८०-८२ ॥ भा.टी.—तीव्र ज्वर, अंगमर्द तथा सन्धिशूल युक्त आमवात में इस रस का सेवन करने से शीघ्र ही आराम आता है। सब शरीर में शीत कम्प अंगमर्द और तीव्र शिरोवेदना के साथ होनेवाला वातिक ज्वर इसके प्रयोग से शान्त हो जाता है। इसके अतिरिक्त नवज्वर अथवा जीर्णज्वर और सविरामज्वर (एक या दो दिन रुककर आनेवाला) में भी यह लाभ करता है ॥८०-८२ ॥ पञ्चामृतरसः अमृतं तोलकमितं रसं गन्धञ्च तन्मितम् । मरिचं टङ्कणञ्चैव तोलकत्रितयोन्मितम् ॥ ८३ ॥ समादाय ततो वारा वटिका रक्तिकोन्मिताः । निर्यापयेद्भिषग्वर्यो रसः पञ्चामृताभिधः ॥ ८४ ॥ विविधोत्थानसंस्थानं विविधस्थानसंस्थितम् । ज्वरातःसार युक्तञ्च शोथं हन्त्यविशालम्बितम् ॥८५॥ जलोदरं शिरःशूलं पीनसञ्च गलग्रहम् । नासारोगं कण्ठरोगं हन्ति च श्लैष्मिकामयम् ॥ ८६ ॥ भा.टी.—शुद्ध वत्सनाभ एक तोला, शुद्ध पारा एक तोला, शुद्ध गन्धक एक तोला, कालीमिरच तथा शुद्ध टंकण; प्रत्येक तीन-तीन तोला लेकर एकत्र खरल में जल से पीस लें, जब गोली बनने योग्य हो जाय तो इसकी एक-एक रत्ती की गोलियाँ बना लें। इसको पञ्चामृत रस कहते हैं। विविध कारणजन्य