रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६६ रसतरङ्गिणी भा.टी.—अफीम बालकों को बूढों को तथा मधुमेह के रोगियों को नहीं देनी चाहिए। हाथ पैर ठंडे होने की अवस्था में विसूचिका में भी अफीम नहीं देनी चाहिए और अधिक निकलनेवाले श्लैष्मिक कास में तथा वृक्कशोथ होने पर अफीम का सेवन नहीं करना चाहिए ॥२५६-२५७॥ वक्तव्य—बच्चों पर अफीम का विषैला प्रभाव थोड़ी मात्रा में भी हो जाता है। अतः एक वर्ष तक के बच्चे को अफीम नहीं देनी चाहिए। यदि अफीम देना आवश्यक हो तो आधा बूँद अहिफेनासव दे सकते हैं। कितनों को अफीम की थोड़ी मात्रा भी अनुकूल नहीं पड़ती है। निरन्तर अफीम देने से इसकी साधारण मात्रा स्वाभाविक हो जाती है, अतः इसकी मात्रा बढ़ानी पड़ती है। तीव्र शूलों में रोगी अफीम की अधिक मात्रा को सह लेता है। अफीम के साथ बैलेडोना ( Balladona ) या धतूरा मिला देने से इसका मलबन्धक प्रभाव कम हो जाता है। हृदय फुफ्फुस के रोगों में अफीम का प्रयोग बड़ी सावधानी से करना चाहिए, क्योंकि यह हृदयगति का अवसादक होती है। बाह्यप्रयोगे अहिफेनस्य गुणाः अहिफेनं विशेषेण खलु बाह्यप्रयोगतः। फुप्फुसच्छदशोथघ्नं त्वन्त्रावरणशोथनुत् ॥२५८॥ विविधोत्थानसम्भूतां विविधस्थानसंश्रयाम्। तथा विविधसंस्थानां वेदनां विनिहन्त्यलम् ॥२५९॥ अभिष्यन्दप्रशमनं कर्णशूलनिबर्हणम्। कृमिदन्तोत्थशूलघ्नं त्वामवातापहं तथा ॥२६०॥ गुदामयहरञ्चैव पायुस्थविदरापहम्। व्रणपीडाप्रशमनं नाडीनामवसादनम् ॥२६१॥ बहिःप्रयोगे अहिफेनगुणाः—फुप्फुसच्छदः फुप्फुसावरणी श्लैष्मिकी कला, तत्र जातं शोथं हन्ति तथा अन्त्राणामावरककलाशोथञ्च हरतीति। विविधं नाना- प्रकारं यत् उत्थानं निदानं तस्माज्जाताम्, शरीरे विविधस्थानेषु अङ्गप्रत्यङ्गेषु समाश्रिताम्, विविधसंस्थानां बहुविधरूपाम्, वेदनां पीडां व्यथामिति यावत्। अभिष्यन्दः अक्षिरोगविशेषः। पायुस्थो विदरश्चीरः तस्य विनाशकम्। नाडीनां अवसादनं दौर्बल्यकरम् ॥२५८-२६१॥ भा.टी.—अफीम बाह्य प्रयोग में विशेष रूप से फुफ्फुस शोथ (निमोनिया) तथा अन्त्रावरण शोथ (पेरिटोनाइटिस) को नष्ट करती है। इस तरह बाह्य-