भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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लगती हो तो इसके योगों के सेवन से आराम आता है। आधे शिर में पीड़ा के साथ होनेवाला काच रोग (मोतिया बिन्द) अर्थात् नीला मोतिया में इसके सेवन से आराम आता है। इसके सेवन से अथवा बाह्यप्रयोग से स्था- निक रक्तवाहिनी में संकोच हो जाता है और कर्ण एवं नेत्रों को श्रवण एवं दर्शन शक्ति बढ़ती है ॥३६६-४१३॥ वक्तव्य—विजया थोड़ी मात्रा में अग्निदीपक एवं क्षुधावर्धक है। अहिफेन के समान अतीसार प्रवाहिकाहर है, किन्तु मलबन्धक नहीं है। इसका विशेष प्रभाव मस्तिष्क पर होता है। थोड़ी मात्रा में यह हर्षजनक, मध्यम मात्रा में प्रलापक और अति मात्रा में निद्राजनक है। प्रथमावस्था में खानेवाले को शारीरिक और मानसिक परिश्रम का स्मरण नहीं रहता है और वह बहुत प्रसन्नचित्त प्रतीत होता है। उसे समय और व्यक्ति का ठीक ठीक ज्ञान नहीं रहता है। दूसरी अवस्था में अर्थात् जब विजया की मात्रा कुछ अधिक हो तो मादक (नशा) प्रभाव होता है। मनुष्य प्रत्येक बात पर खूब हँसता और उच्छृङ्खल होकर बोलता है। यदि अधिक मात्रा दी जाय तो मनुष्य निद्रित और शिथिल हो जाता है। मस्तिष्क के अतिरिक्त वातनाड़ियों पर भी इसका प्रभाव होता है। संज्ञावाहिनियों के निःसंज्ञ हो जाने से संज्ञानाशक प्रभाव त्वचा पर होता है। शरीर की शूल न्यून हो जाती या लुप्त हो जाती है। अतः विजया शूलहर है। यद्यपि विजया का शूलहर प्रभाव अहिफेन और धतूर की अपेक्षा कुछ निर्बल है। यदि मांसपेशियों में तीव्र उद्धर्त आक्षेप हो तो वे भी विजया के द्वारा शान्त हो जाते हैं, जिससे आक्षेप रोग, हनुस्तम्भ- रोग तथा अन्य वातरोग में आराम आता है। थोड़ी मात्रा में देने से यह उत्पादक अंगों का बल बढ़ाने के कारण बाजीकरण भी है। भंगाया मात्रा द्विगुञ्जातः समारभ्य चतुर्गुञ्जमितां परम्। भङ्गां खलु प्रयुञ्जीत बलकालाद्यपेक्षया ॥४१४॥ भा.टी.—रोग तथा रोगी का बलाबल देखकर, देश, काल आदि का निश्चय करके विजया को दो रत्ती से लेकर चार रत्ती की मात्रा तक प्रयोग करना चाहिये। ४१४॥ भंगाया आग्रिमकः प्रयोगः आर्द्रा विशुष्का वा भङ्गा त्वजादुग्धेन पेषिता। प्रलिप्ता पादतलयोः निद्रां जनयति द्रुतम् ॥४१५॥