रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७३२ रसतरङ्गिणी विपाचितं गण्डमालां निहन्त्यभ्यङ्गतोगतः ॥४६०॥ एरण्डतैलसंयुक्तं गुञ्जापत्रं सुपेषितम् । कोष्णोपनाहयोगेन वेदनाहरमुत्तमम् ॥४६१॥ गुञ्जापत्ररसे पक्वं तैलमभ्यञ्जयोजितम् । शोथप्रशमनं चैव वेदनाहरमीरितम् ॥४६२॥ गुञ्जापत्रं नवं वापि विशुष्कं चूर्णितं भृशम् । नाशयत्यचिरादेव स्वरभेदमसंशयम् ॥४६३॥ द्वितीयं तैलम्—गुञ्जाबीजं गुञ्जाशिफा च कल्कः पलद्वयमितः तैलस्याष्टौ पलानि, जलस्य षोडश पलानि, पक्वं गण्डमालाहरम् ॥४६०-४६३! भा.टी.—गुञ्जाबीज आधा भाग, गुञ्जामूल आधा भाग, तिल तैल चार भाग, जल आठ भाग लेकर, पहिले गुञ्जाबीज और मूल को जल के साथ पीस कर कल्क बना लें । अब इन तीनों को एकत्र एक पात्र में डालकर स्नेहसाधन विधि से तैल सिद्ध कर लें । इस तैल को कुछ दिन निरन्तर कण्ठमाला की ग्रन्थियों पर मालिश करने से वे बैठ जाती हैं । गुञ्जापत्रों को कुछ एरण्ड तैल मिलाकर पीसकर गुन-गुनी पुलटिस बाँधने से उस स्थान की वेदना शान्त होती है । यदि केवल गुञ्जापत्रस्वरस में तिलतैल सिद्ध करके शरीर पर मालिश की जाय तो शरीर की शोथ की वेदना शान्त होती है । हरे गुञ्जापत्रों अथवा सूखे हुए पत्रचूर्ण को थोड़ा-थोड़ा करके मुख में चबाकर चूसने से स्वरभेद में अवश्य आराम आता है ॥४६०-४६३॥ गुञ्जाजीवनरसः गुञ्जाबीजं सुविमलं सार्द्धतोलकसंमितम् । तन्मितं रससिन्दूरं तयोश्च द्विगुणीकृताम् ॥४६४॥ विशोधितां तु विजयां समादाय भिषग्वरः । संपेष्य वटिकाः कार्या गुञ्जाद्वितयसंमिताः ॥४६५॥ रसोऽयं तु समाख्यातो गुञ्जाजीवनसंज्ञकः । बलसञ्जननश्चैव मदनोद्दीपनः परम् ॥४६६॥ गुञ्जाजीवनरसः—गुञ्जाबीजं १॥ तो०, रससिन्दूरं १॥ तो०, बब्बूलकषायेण शोधितायाः भङ्गायाः षट्टोलकानि । स्पष्टमन्यत् ॥४६५, ४६६॥ भा.टी.—शुद्ध गुञ्जाबीज डेढ़ तोला, रससिन्दूर डेढ़ तोला और शुद्ध भाँग की पत्ती तीन तोला लेकर तीनों को एकत्र जल के साथ पीसकर दो-दो रत्ती की