रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७३४ रसतरङ्गिणी हवा लगने पर या पकने पर काला हो जाता है। इसका बीज मीठा और एक प्रकार के तेल से युक्त होता है। विश्लेषण—फल की बाहरी त्वचा में एक छाला डालने वाला तैल ३२% होता है जो ईथर में घुल जाता है। भल्लातकस्य परिचयः भल्लातकः समाख्यातः शाखिजातीयकस्तरुः । जायतेऽद्रिषु बाहुल्याद् फलं तस्य प्रयुज्यते ॥ ४७२ ॥ भल्लातकपरिचयः—अद्रिष्विति पर्वतेषु । भल्लातकशोधनप्रयोजनं निगद- व्याख्यातम् ॥ ४७२ ॥ भा.टी—भिलावा, एक डाल पत्तीवाला वृक्ष है। प्रायः पर्वतों में पाया जाता है और इसका फल प्रयोग में आता है ॥ ४७२ ॥ ग्राह्यभल्लातकस्य स्वरूपम् भल्लातकानि पक्वानि नीरक्षिप्तानि यानि तु । निमज्जन्ति हि तान्येव ग्राह्याणीह विशुद्धये ॥ ४७३ ॥ भा.टी—औषधिकार्य में शोधन करने योग्य भिलावे के वे फल उत्तम सम- झने चाहिए जो पकने के बाद यदि उन्हें पानी में डाला जाय तो डूब जायें । न डूबनेवाले फलों को शोधन के अयोग्य समझना चाहिए ॥ ४७३ ॥ भल्लातकस्य शोधनप्रयोजनम् भल्लातस्य तु रसः स्वल्पोऽपि पतितस्त्वचि । करोति दारुणं दाहं व्रणं चैवातिदारुणम् ॥ ४७४ ॥ शोथं सञ्जनयत्याशु तीव्रदाहसमन्वितम् । मुखे निपतितो घोरं वीसर्पं प्रकरोति वै ॥ ४७५ ॥ उक्तोपद्रवशान्त्यर्थं फलं भल्लातकोद्भवम् । शोधयेद्भिषजां वर्यः सावधानतया सदा ॥ ४७६ ॥ भा.टी—यदि भिलावे का रस बहुत ही थोड़ी मात्रा में भी शरीर के किसी स्थान पर लग जाय तो वहाँ पर भयंकर दाह और व्रण हो जाता है। यदि वह . मुख में लग जाय तो तीव्र दाहयुक्त शोथ तथा वीसर्पशोथ को उत्पन्न कर देता है। अतः वैद्य को उक्त उपद्रवों से बचने-बचाने के लिए भिलावे के फलों को बड़ी सावधानी से शुद्ध करके काम लाना चाहिए ॥ ४७४-४७६ ॥