रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७३६ रसतरङ्गिणी भल्लातकः कटुस्तिक्त अत्युष्णः कृमिनाशनः । रसायनो वलकरो गुल्मार्शोग्रहणीहरः ॥४८०॥ कुष्ठामयप्रशमनः कफवातोदरापहः । विवन्धाध्मानशूलघ्नः श्वासादिगदनाशनः ॥४८१॥ भा.टी.—भिलावे के फल रस में चरपरे (कटु) तथा कड़वे होते हैं । गुणों में यह अत्यन्त उष्ण तथा कृमिनाशक हैं। इनके विधिपूर्वक सेवन करने से शरीर में रसायनगुण उत्पन्न होते हैं और शरीर में वल की वृद्धि होती है । इनको गुल्मरोग तथा अर्शारोग में प्रयोग करने से शीघ्र लाभ होता है । इनके प्रयोग से कुष्ठरोग नष्ट होता है और कफवात-प्रकोपजन्य उदररोग शान्त होते हैं । आँतों की दुर्बलता से होनेवाले विबन्ध तथा आधमान और शूल में इनके प्रयोग से लाभ होता है और श्वास आदि रोगों में भी आराम आता है ॥४८०, ४८१॥ वक्तव्य—भिलावा आमाशय के लिए दीपक,वातनाड़ियों, श्वाससंस्थान, हृदय तथा त्वचा के लिए उत्तेजक और यकृत् के लिए पित्तनिस्सारक है । कहा जाता है कि जो मनुष्य शरद् ऋतु में इसके द्वारा बनाये हुए घृत का सेवन करता है वह रोगों से बचा रहता है। इसके सेवन से वृद्धावस्था देर से आती है । बाल देर तक काले रहते हैं और दाँत भी देर तक दृढ़ रहते हैं । तेल में दग्ध किये हुए भल्लातकचूर्ण में लवण मिलाकर बनाया हुआ मञ्जन दाँतों पर मलने से दाँत स्थिर होते हैं। श्वित्रकुष्ठ (सफेद कोढ़) के चिह्नों पर भल्लातकतैल का लेप लगाने से उनमें छोटे-छोटे छाले पड़ जाते हैं जो सूखकर काला चिह्न छोड़ जाते हैं, फिर ये कृष्णवर्णा चिह्न आपस में मिल कर त्वचा को सवर्ण कर देते हैं। सन्धिशोथों में गहरी शोथ को हटाने के लिए भल्लातक तेल के लेप लगाये जाते हैं। क्लीबरोग के लिए शिश्नेन्द्रिय पर भल्लातकादिलेप लगाने से हलके छाले पड़ जाते हैं और अन्दर का रक्तसञ्चय दूर हो जाता है। भारी चोट लगने से शरीर में तीव्र शोथ हो जाय तो एक शुद्ध भिलावे को तोड़कर घृत में तल करके उस घृत से बनाया हुआ हलवा (गुड़ का) खिलाया जाय तो शोथ को बहुत शीघ्र आराम आता है । चिरस्थायी त्वक्रोगों, फिरंगजन्य व्रणों और अर्बुदों में भिलावे के योग देने से आराम आता है । श्वासरोग, चिरस्थायी कास, प्रतिश्याय आदि में कुछ काल निरंतर भल्लातक घृत या इसके किसी अन्य योग का सेवन करना चाहिए । वात- कफजन्य अजीर्ण और मन्दाग्नि के उपद्रवों तथा अर्शारोग में इसके