भारतकोश
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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७३८ रसतरङ्गिणी भा.टी.—शुण्ठीचूर्ण, विडंगचूर्ण और लोहभस्म तथा भिलावाचूर्ण प्रत्येक समभाग में लेकर एकत्र पीसकर रख लें । इनमें से उचित मात्रा में लेकर घी और शहद को मिलाकर निरन्तर तीन मास तक सेवन करने से शरीर में रक्त की वृद्धि होती है और बल बढ़ता है, जिससे शरीर में नवयौवन की सुन्दरता आ जाती है । इसको भल्लातक रसायन कहते हैं । इसको रक्ताल्पता (खून की कमी) रोग दूर करने के लिए सावधानी के साथ सेवन करना चाहिए ॥४८४-४८६॥ अथ करवीरस्य नामानि करवीरो हयारिश्च हयमारोऽश्वमारकः । अश्वान्तकोऽश्वहाश्वघ्नो मतश्चएडातकस्तथा ॥४८७॥ करवीरः श्वेतपीतरक्तपुष्पविभेदतः । त्रिविधस्तु समाख्यातो वैद्यविद्याविशारदैः ॥४८८॥ भा.टी.—करवीर, हयारि, हयमार, अश्वमार, अश्वान्तक, अश्वहा, अश्वघ्न, चएडातक, ये सब नाम करवीर (कनेर) के कहे जाते हैं । कनेर श्वेतपुष्प, रक्त- पुष्प और पीतपुष्प भेद से तीन प्रकार का माना जाता है ॥४८७, ४८८॥ करवीरस्य परिचयः करवीरः समाख्यातः सर्वत्र सुलभस्तरुः । भिषग्वरैरस्य मूलं मतं तूपविषाह्वयम् ॥४८६॥ करवीरस्य मूलत्वक् तद्रसो वा निषेवितः । करोति हि विशेषेण मोहदाहभ्रमादिकम् ॥४६०॥ करवीरकमूलन्तु बाह्ययोगे प्रयुज्यते । आभ्यन्तरः प्रयोगोऽस्य न कुत्रापि प्रकीर्तितः ॥४६१॥ करवीरपरिचयः—निगदव्याख्यातः । प्रायश्चौषधेषु श्वेतकरवीरस्यैव प्रयोग इति सम्प्रदायः ॥४८६-४६१॥ भा.टी.—कनेर सर्वत्र सुलभ रूप से पाये जानेवाला वृक्ष है । वैद्य लोग इसकी मूल को उपविष मानते हैं । कनेर मूल की छाल अथवा त्वक्रस को अधिक मात्रा में सेवन किये जाने पर विशेष रूप से मोह, दाह तथा भ्रम आदि विकार उत्पन्न होते हैं । कनेर की जड़ की छाल प्रायः बाह्य रोगों में ही काम आती है । आभ्यन्तर प्रयोग के लिए इसका उपयोग विरलावस्था में ही पाया जाता है॥४६१॥ करवीरस्य बाह्यप्रयोगः करवीरकमूलं तु वारिणा परिपेषितम् ।