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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा

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[Page Header] ७५८ रसततरङ्गिणी

वृश्चिकविषनाशक गुटिका

सिरसबीज, केसर, करञ्जबीज, कुष्ठचूर्ण और मैनसिल को समभाग प्रमाण में लेकर जल के साथ पीसकर गोली बना लें। इन गोलियों को जल में घिसकर बिच्छू के दंशस्थान पर लगावें तो भयंकर बिच्छू का जहर उतर जाता है।

तन्द्राहरी वर्तिका

शुद्ध मैनसिल को लहसुन के स्वरसं में खूब अच्छी तरह घोट इसकी बत्तियाँ बना लें। इस वर्तिका को वैद्य लोग तन्द्राहरी-वर्तिका कहते हैं; क्योंकि इसके लगाने से शीघ्र ही तन्द्रा दूर हो जाती है। इस वर्तिका को सरसों के तैल अथवा जल के साथ स्वच्छ पत्थर पर घिसकर नेत्रों में आँजने से सन्निपात- ज्वरादि में होनेवाली तन्द्रा दूर हो जाती है।

वातेभकेशरी रस

शुद्ध सोमल कालीमिर्चचूर्ण, लौंगचूर्ण, शुद्ध वत्सनाभचूर्ण, छुहारे की गुठली का चूर्ण, जायफलचूर्ण, और करीर की कोंपलें, प्रत्येक एक-एक तोला, अफीम और मिश्री २-२ तोला लें। सबको एकत्र खरल में बड़ के दूध से मर्दनकर सरसों के बराबर गोलियाँ बना लें। (सि० भै० म०) मात्रा—१ से ३ गोली, दिन में दो-तीन बार दें। उपयोग और अनुपान--इस रस को श्वसनकसन्निपात (Pneumonia) में मिश्री के साथ देने से तत्काल लाभ प्रतीत होता है। श्वास, कास और कफ- प्रधान सन्निपात में शहद के साथ, और मरणासन्न बेहोशी की अवस्था में १- १ रत्ती सफेद कत्था और अकरकरे के साथ देने से कफप्रकोप शान्त होकर रोगी होश में आ जाता है और उसकी रुकी हुई जबान खुल जाती है। हिचकी में मूली के बीज के साथ, अतीसार में छोटी हरड़, सौंफ और जीरे के साथ, रक्तप्रदर में शहद या घी के साथ, सिरदर्द में नकछिकनी के साथ नस्य के रूप में, अफारा में अदरक के रस के साथ सेवन करायें और नाभि पर चूहे की मींगनी का लेप करायें, एकाहिक, तृतीयक, चातुर्थिक आदि विषम ज्वरों में गुड के साथ, पित्तज्वर में शक्कर के साथ, नपुंसकता में दूध की मलाई के साथ, सुजाक में गुलाब के गुलकन्द या शक्कर के शर्बत के साथ, वाजीकरण के लिए जायफल और कस्तूरी के साथ देने से अच्छा काम करता है।

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