रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७७२ 'रस्तरङ्गिणी अहिफेन तैल स्वच्छ और शुद्ध अफीम एक तोला लेकर इसको एक पाव स्वच्छ जल में घोल लें, अब इसमें दस तोला धत्तूरे के पत्तों का रस और एक पाव तिलतैल मिलाकर स्नेहसाधन विधि के अनुसार तैल को सिद्ध करलें। जब तैल ठीक सिद्ध हो जाय तो इसे छानकर कांच की शीशी में भरकर रखलें। यह तैल विशेष रूप से बेचैन करनेवाले कान के दर्द को नष्ट करने के लिए अचूक औषधि है। इसे कान के शूलवालों को सदा अपने पास रखना चाहिए। भल्लातकादि कषाय शुद्ध भल्लातकचूर्ण, गिलोय, सोंठ, पुनर्नवा, देवदारु, प्रत्येक समभाग में लेकर एकत्र करके कषाय बना लें। इस कषाय के कुछ दिन सेवन करने से ऊरुस्तम्भ रोग नष्ट होता है। अथवा पिप्पली, पिप्पलीमूल और भिलावे का कषाय अथवा इनका कल्क बनाकर उसमें मधु मिलाकर सेवन करने से ऊरुस्तम्भ शीघ्र ही नष्ट होता है। भल्लातकादिगुटिका शुद्ध भिलावा सौंठचूर्ण, बिंदहाराबीजचूर्ण प्रत्येक समभाग में लेकर एकत्र पीस लें। अब इसमें सब के बराबर गुड़ मिलाकर घोटकर एक-एक मासे की गोलियाँ बना लें। इनको भल्लातकादि गुटिका कहते हैं। इनके सेवन से बवा- सीर रोग में लाभ होता है। भल्लातकादि लेप भिलावाचूर्ण को एक सिल पर शहत मिलाकर खूब बारीक घोटकर उसमें एरण्डतैल मिला दें। इस लेप को शिर पर लगाने से बहुत शीघ्र इन्द्रलुप्त (बालों का उड़ जाना) रोग में आराम आता है। भल्लातक रसायन शुद्ध भिलावाचूर्ण, सोंठचूर्ण, लोहभस्म, वायविडंगचूर्ण और तिल, इन सबको एकत्र मिला पीसकर रख लें। इस चूर्ण में से उचित मात्रा में लेकर शहत के साथ चाटने से समय से पूर्व आयी जरा (बुढ़ापा) दूर होती है और शरीर सुन्दर-दर्शनीय हो जाता है। । समाप्त ।