रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री) द्वारा
परिशिष्ट ७७१ कुछ वैद्य अर्क दुग्ध के स्थान में गोदुग्ध का उपयोग करते हैं । इस विधि से बनायी हुई भस्म अधिक सौम्य और पित्त शामक होती है । मात्रा— १ से २ रत्ती, दिन में २ बार शहद और पिप्पलीचूर्ण, गुलकन्द, नींबू का रस, अथवा अनार रस के साथ देवें । गुण— यह रस आनाह, गुल्म, उदररोग, प्लीहा, बद्धोदरश्वास, कास, मन्दाग्नि, कफ वात प्रकोपजन्यरोग, अजीर्ण हृद्रोग, ग्रहणी, अतीसार, बाल ग्रह रोग, प्रमेह, मूत्ररोग, अश्मरी रोगों को दूर करता है । कफवात प्रकोपजन्य रोगों और उदर रोगों में अर्क दुग्ध से बनी हुई भस्म अधिक लाभ करती है । प्रवाल पञ्चामृत रस का कार्य विशेष रूप से मध्यकोष्ठ, यकृत्, प्लीहा और ग्रहणी पर अच्छा होता है। पाचक पित्त के द्रवत्वधर्म के न्यून होने पर पेट में भोजन के बाद भारीपन होता हो अथवा अफारा आता हो, यह रस उत्तम कार्य करता है। पाचक पित्त की अधिक वृद्धि (द्रवत्व की) में जब अम्लोद्गार कण्ठदाह आदि लक्षण होने पर इसको दाडिमावलेह या अनार रस के साथ देने से पित्त की अम्लता कम हो जाती है। परन्तु इसको कुछ काल निरन्तर उपयोग में लाना चाहिए । नवजीवन मलहर शुद्ध अफीम तीन मासे, मोम का तैल छः तोला, त्रिफलाभस्मचूर्ण एक तोला, गन्धाविरोजा एक तोला, लेकर एक स्वच्छ पात्र में डालकर अग्नि में पकावें और करछी से चलाते जायँ । जब पिघलकर सब एक और गाढ़ा-सा हो जाय तो नीचे उतारकर एक चौड़े मुँह की शीशी में रखलें और उसका ढक्कन बन्द कर दें । इसको नवजीवन मलहर कहते हैं । इस मलहर को आवश्यकता- नुसार एक साफ नवीन कपड़े पर लगाकर, जिस व्रण पर लगाना हो उसे पहिले नीम के क्वाथ से अच्छी तरह धोकर साफ करलें, फिर इस फाहे को उस व्रण पर चिपका दें । इस मरहम के लेप से सूजाक के कारण होनेवाले वेदनायुक्त दुष्ट व्रण निःसन्देह ठीक हो जाते हैं । कर्णमूल हर लेप अफीम एक मासा, एलुआ और हरिद्रापुष्प एक तोला लेकर दोनों को एकत्र खरल में धत्तूरे के पत्तों के रस से पीसकर अग्नि में गुनगुना गरम करलें । इस लेप को कर्णमूल में दो तीन बार लेप करने से शीघ्र ही कर्णमूलशोथ नष्ट हो जाता है ।
७७२ 'रस्तरङ्गिणी अहिफेन तैल स्वच्छ और शुद्ध अफीम एक तोला लेकर इसको एक पाव स्वच्छ जल में घोल लें, अब इसमें दस तोला धत्तूरे के पत्तों का रस और एक पाव तिलतैल मिलाकर स्नेहसाधन विधि के अनुसार तैल को सिद्ध करलें। जब तैल ठीक सिद्ध हो जाय तो इसे छानकर कांच की शीशी में भरकर रखलें। यह तैल विशेष रूप से बेचैन करनेवाले कान के दर्द को नष्ट करने के लिए अचूक औषधि है। इसे कान के शूलवालों को सदा अपने पास रखना चाहिए। भल्लातकादि कषाय शुद्ध भल्लातकचूर्ण, गिलोय, सोंठ, पुनर्नवा, देवदारु, प्रत्येक समभाग में लेकर एकत्र करके कषाय बना लें। इस कषाय के कुछ दिन सेवन करने से ऊरुस्तम्भ रोग नष्ट होता है। अथवा पिप्पली, पिप्पलीमूल और भिलावे का कषाय अथवा इनका कल्क बनाकर उसमें मधु मिलाकर सेवन करने से ऊरुस्तम्भ शीघ्र ही नष्ट होता है। भल्लातकादिगुटिका शुद्ध भिलावा सौंठचूर्ण, बिंदहाराबीजचूर्ण प्रत्येक समभाग में लेकर एकत्र पीस लें। अब इसमें सब के बराबर गुड़ मिलाकर घोटकर एक-एक मासे की गोलियाँ बना लें। इनको भल्लातकादि गुटिका कहते हैं। इनके सेवन से बवा- सीर रोग में लाभ होता है। भल्लातकादि लेप भिलावाचूर्ण को एक सिल पर शहत मिलाकर खूब बारीक घोटकर उसमें एरण्डतैल मिला दें। इस लेप को शिर पर लगाने से बहुत शीघ्र इन्द्रलुप्त (बालों का उड़ जाना) रोग में आराम आता है। भल्लातक रसायन शुद्ध भिलावाचूर्ण, सोंठचूर्ण, लोहभस्म, वायविडंगचूर्ण और तिल, इन सबको एकत्र मिला पीसकर रख लें। इस चूर्ण में से उचित मात्रा में लेकर शहत के साथ चाटने से समय से पूर्व आयी जरा (बुढ़ापा) दूर होती है और शरीर सुन्दर-दर्शनीय हो जाता है। । समाप्त ।
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चिकित्सा की अद्भुत पुस्तकें अष्टांगहृदयम्—सं० लालचन्द्र वैद्य (अजिल्द) १००; (सजिल्द) १५० आधुनिक चिकित्साशास्त्र—धर्मदत्त वैद्य (अजिल्द) १३०; (सजिल्द) १७५ चरकसंहिता—जयदेव विद्यालंकार (हिन्दी अनुवाद सहित) सम्पूर्ण दो भागों में (अजिल्द) १३५; (सजिल्द) २२० नव्य जनस्वास्थ्य तथा स्वास्थ्यविज्ञान—डा० मुकुन्दस्वरूप वर्मा ३० नाड़ी दर्शन—ताराशंकर वैद्य १५ पाश्चात्य द्रव्यगुणविज्ञान—(दो भागों में)—रामसुशीलसिंह २२५ भावप्रकाशनिघण्टु—विश्वनाथ द्विवेदी (अजिल्द) ४४; (सजिल्द) ७० भैषज्यरत्नावली—जयपाल विद्यालंकार (अजिल्द) २००; (सजिल्द) ३०० माधवनिदान—नरेन्द्रनाथ शास्त्री (अजिल्द) ८०; (सजिल्द) १५० मानव-शरीर-रचना—(खण्ड १, २ एवं ३) डा० मुकुन्दस्वरूप वर्मा खण्ड १ (अजिल्द) ६०; (सजिल्द) ९० खण्ड २ (अजिल्द) ७५; (सजिल्द) १०० खण्ड ३ (अजिल्द) १३०; (सजिल्द) १६० मेघविनोद—नरेन्द्रनाथ शास्त्री ६ यूनानी-चिकित्सा-सागर—हकीम मन्साराम शुक्ल ५ रसरत्नसमुच्चय—वैद्य धर्मानन्द शर्मा (अजिल्द) ६०; (सजिल्द) १२० रसेन्द्रसारसंग्रह—नरेन्द्रनाथ (अजिल्द) २०; (सजिल्द) २५ वर्मा एलोपैथिक गाइड—रामनाथ वर्मा ८० वर्मा एलोपैथिक चिकित्सा—रामनाथ वर्मा ३० वर्मा एलोपैथिक निघण्टु (मेटीरिया मेडिका)—रामनाथ वर्मा ७५ शालाक्यविज्ञान—प्रमोदलाल भाटिया (अजिल्द) २०; (सजिल्द) ३० सुश्रुतसंहिता (शारीरस्थान)—जे० डी० शर्मा ८ सुश्रुतसंहिता (सम्पूर्ण)—अत्रिदेव विद्यालंकार (अजिल्द) १४०; (सजिल्द) १६० मोतीलाल बनारसीदास दिल्ली वाराणसी पटना बंगलौर मद्रास मूल्य : रु० ५५ (अजिल्द); रु० ८५ (सजिल्द)