रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ७६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । शुद्ध वंग और शुद्ध हरितालको आकके दूधमें रगडे ( पहिले वंगको पिघला उसमें आधा भाग पारा डाल उतारकर खरलमें डाले फिर हरिताल मिला रगडे ) इसकी चौडीसी टिकिया बना इसको अश्वत्थ ( पीपलवृक्ष ) के सूखे छिलकोंके चूर्णमें रख कपडमट्टी कर पुटमें फूंक दे, इस प्रकार सात पुटें दे तो उत्तम वंगभस्म हो जायेगी। (कोई ऐसा अर्थ करते हैं कि हरितालको आकके दूधमें रगडकर वंगके कंटकवेधी पत्रोंपर लेपकर पीपलके छिलकोंसे सात बार लपेट पुट देवे तो एक पुटमें ही भस्म हो जायगी । परंतु यह असंगत है, क्योंकि सूखे अश्वत्थ छिलकोंसे सप्तधा वेष्टित कैसे हो सकता है ? किंतु ऐसा आम लोग करते हैं कि वंगके छोटे २ पत्र कर अश्वत्थके छिलकोंके चूर्णपर चावलसे जमाकर ऊपरसे और अश्वत्थके छिलकोंका चूर्ण डाल नीचे' ऊपर उपले लगा आग लगा देते हैं तो शीतल होनेपर खीलोंके समान फूले हुए भस्मके टुकडे मिलेंगे । परंतु इससे उपरोक्त सात- पुटी भस्म गुणमें उत्तम होती है ) ॥ ९७ ॥ विशुद्धवंगपत्राणि द्रावयेद्धाण्डिकान्तरे । अपामार्गोद्भवं चूर्णं तत्तुल्यं तत्र मेलयेत् ॥ ९८ ॥ स्थूलाग्रया लोहदर्व्या शनैस्तदभिमर्दयेत् । यावद्भस्मत्वमाप्नोति तावन्मर्द्यन्तु पूर्ववत् ॥ ९९ ॥ ततस्त्वेकीकृतं चूर्णं कृत्वा चांगारवर्जितम् । नूतनेन शरावेण रोधयेच्च भिषग्वरः । पश्चात्तीव्राग्निना पक्वं वंगभस्म भवेद् ध्रुवम् ॥३००॥ दूसरी विधि-शुद्ध वंगको एक तौलेमें डाल चूल्हेपर चढ़ावे नीचे अग्नि जलावे जब पिघल जावे तो इसमें वंगके बराबर अपामार्गका चूर्ण बुर्की २ कर एक बडे मुखकी लोहेकी कडछीसे धीरे २ रगडता रहे जबतक वंगकी उस पात्रमें ही भस्म न होजाये तबतक थोडा थोडा अपामार्गका चूर्ण मिला रगडता ही रहे। जब भस्माकार बन जाय तो