रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ७७ ) इसमेंसे अंगारी आदि निकाल इस भस्मको उसी तौलेमें एकत्र कर ऊपरसे औंधा शराव रख भस्मको ढक दे नीचे तीव्र अग्नि जलावे । अथवा इसको उतार शीतल होनेपर पानी डालकर अपामार्गकी भस्मको धोकर अलग कर दे और नीचेसे स्वच्छ वंगभस्म लेकर धूपमें सुखा इसमें आकका दूध मिला नवीन दो शरावोंमें बंद कर तीक्ष्णाग्निसे पकावे तो वंगकी भस्म हो जायगी ॥ ९८-३०० ॥ वङ्गं खर्परके कृत्वा चुल्ल्यां संस्थापयेत्सुधीः । द्रवीभूते पुनस्तस्मिंश्चूर्णान्येतानि दापयेत् ॥ १ ॥ प्रथमं रजनीचूर्णं द्वितीये च यमानिका । तृतीये जीरकञ्चैव ततश्चिञ्चात्वगुद्भवम् ॥ २ ॥ अश्वत्थवल्कलोत्थञ्च चूर्णं तत्र विनिःक्षिपेत् । एवं विधानतो वङ्गं म्रियते नात्र संशयः ॥ ३ ॥ तीसरी विधि-वंगको मृत्कपाल ( तौले ) में डाल चूल्हे पर चढावे जब वंग पिघल जावे तो इसमें नीचे लिखे द्रव्योंके चूर्णोंका प्रक्षेप करे। पहिले तो बराबरका हल्दीका चूर्ण डाले जब हल्दीका चूर्ण डाले कुछ देरके बाद इमली वृक्षके छिलकेका चूर्ण डाले तदनंतर पीपलवृक्षके छिलकेका चूर्ण डाले नीचे ( चार प्रहरकी ) तीक्ष्ण अग्नि दे तो वंग भस्म हो जायेगी ( कोई इस भस्मको स्वच्छ कर हरिताल और घीकुमारका गूदा मिला संपुटकर फिर गजपुटमें फूंकते हैं तो अति उत्तम होजाती है ) ॥ १-३ ॥ वंगभस्मके गुण । वङ्गं तिक्ताम्लकं रूक्षं किञ्चिद्वातप्रकोपनम् । मेदःश्लेष्मामयघ्नञ्च क्रिमिघ्नं मेहनाशनम् ॥ ४ ॥ वंगभस्म-तिक्त है, अम्ल है, रूक्ष है, किंचित् वातकारक है । एवं मेदरोगनाश, कफरोगनाश, क्रिमिघ्न और प्रमेहोंको जीतनेवाली है ॥४॥ ४