रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
पृष्ठ 105, कुल 584 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ७९ ) त्रिफलेके क्वाथमें पूर्वोक्त विधानसे शुद्ध किये हुए कान्तलोहको लोहेके हमामदस्तमें कूटकर चूर्ण बनावे । ( त्रिफलेके क्वाथमें बार बार लाल करके बुझानेसे लोहा कूटकर चूर्ण बनाने योग्य होजाता है ) इस चूर्णको वस्त्रमें छान ले फिर त्रिफलेके क्वाथमें बार बार धोकर स्वच्छ कर सूर्यकी तीक्ष्ण धूपमें सुखा लेवे । ( तदनन्तर आगे लिखे लोहमारक गणकी औषधियोंके रसमें भिगोकर धूपमें सुखावे ) ॥ ३०९ ॥ ३१० ॥ क्षालने भानुपाके तु लोहतुल्यं फलत्रिकम् । जलं द्विगुणितं दत्त्वा चतुर्भागावशेषयेत् ॥ ११ ॥ एवमुक्तं फलक्वाथं जलं दत्त्वा पुनःपुनः । शोषयेत्सूर्यतेजोभिर्निरन्तरमहस्त्रयम् ॥ १२ ॥ अथवा तत्र तत्क्वाथे दत्त्वा दत्त्वा भिषग्वरः । सप्तसप्तविधैरेव सप्तवारान् विशोषयेत् ॥ १३ ॥ भानुपाकमें लोहेके बराबर त्रिफला लेकर उस त्रिफलेको दोगुणे जलमें पकावे, जब चौथा भाग जल रहे तो उतारकर छान ले । यह क्वाथ बार बार लोहचूर्णमें डालकर सूर्यकी तेज धूपमें निरन्तर तीन दिन- तक सुखावे । अथवा त्रिफला या आगे कहे “लोहमारक गणकी” औषधियोंका पृथक् पृथक् सात सात वार सातवां सातवां भाग क्वाथ या स्वरस डालकर सुखाता रहे और त्रिफलेके जलसे धोता रहे, इस- प्रकार तेज धूपमें सुखानेकों 'भानुपाक' कहते हैं ॥ ११-१३ ॥ स्थालीपाकविधि । इत्थमादित्यपाकान्ते स्थाल्यां पाकमुपाचरेत् । स्थालीपाके फलं ग्राह्यमयसस्त्रिगुणीकृतम् ॥ १४ ॥ तस्य षोडशिकं तोयमष्टभागावशेषितम् । मृदुमध्यकठोराणामन्येषामयसा समम् ॥ १५ ॥