भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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पृष्ठ 106

( ८० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । क्वथनीयं समादाय चतुरष्टौ च षोडशम् । गुणानां स्थाप्यते तोयं शेषयेदयसा समम् ॥ १६ ॥ स्वरसस्यापि लोहेन स्थालीपाके समानता । स्थाल्यां क्वाथादिकं दत्त्वा यथाविधि विनिर्मितम् । पाकेन क्षीयते यस्मात्स्थालीपाक इति स्मृतः॥१७॥ इस प्रकार भानुपाक करनेके अनन्तर स्थालीपाक करना चाहिये, स्थालीपाकमें त्रिफला लोहेसे तीन गुणा लेकर सोलह गुने पानीमें पकावे आठवां भाग बाकी रहे तो उतारकर छान ले, यह काथ स्थाली- पाकमें प्रयुक्त करे, यह त्रिफलेके काथका परिमाण है । त्रिफलेके सिवाय और सब प्रकारके द्रव्य लोहेके बराबरही लेने चाहिये परन्तु त्रिफला तीनगुणा ही लेकर काथ करे । ( यह स्थालीपाकके काथका परिमाण है ) और जो मृदुद्रव्यका काथ डालना हो तो लोहके बराबर ( भृंगराज आदि ) मृदुद्रव्य लेकर चारगुने जलमें पकावे । यदि पलाश आदि द्रव्य हो तो आठगुने जलमें पकावे । हरड आदि कठोर पदार्थको सोलह गुने जलमें पकावे । जब उसी द्रव्यके बराबर जल रहे तो उतार कर छान ले । यह काथ ऊपर कहे लोहचूर्णमें डालकर किसी पात्रमें चूल्हेपर चढ़ा नीचे अग्नि जलावे और जिस द्रव्यका स्वरस इसमें डालना हो वह भी लोहेके बराबर डालना चाहिये । इस प्रकार स्थाली ( पात्र ) में काथ या स्वरस डालकर अग्निद्वारा पकाकर रस सुखानेको स्थालीपाक कहते हैं, क्योंकि स्थालीद्वारा ही पकाया जाता है इसलिये इसका नाम 'स्थालीपाक' है ॥ १४--१७ ॥ स्थालीपाकमें डालनेके द्रव्य । हस्तिकर्णपलाशस्य मूलं च शतमूलिका । भृङ्गराजाख्यराजानामेषां निजरसैः सह ॥ १८ ॥ मिलित्वा वा विधातव्यं स्थालीपाके फलादनु । यथा दोषौषधेनापि स्थालीपाको विधीयते ॥ १९॥