रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ८१ ) स्थालीपाकमें पहिले त्रिफलेका काथ डालकर पकावे उस काथके सूखनेपर हस्तिकर्ण, पलाशकी जड़का रस, जिमीकन्दका रस, शतावरका रस, भांगरेका रस और जामुनके फलोंका रस, अमलतासका रस क्रम- पूर्वक डालकर सुखावे । अथवा जिस दोषकी शांतिके लिये लोहभस्म सेवन करना हो उस दोषको नाश करनेवाले द्रव्यके स्वरसमेंभी स्थाली- पाक करना हितकारक है ॥ १८ ॥ १९ ॥ पुटपाकविधि । स्थालीपाके सुसंपक्वं प्रक्षाल्य स्वच्छवारिणा । शुष्कं संचूर्ण्य यत्नेन पुटपाके प्रयोजयेत् ॥ पुटाद्दोषविनाशः स्यात्पुटादेव गुणोदयः ॥३२०॥ म्रियते च पुटालोहः पुटं तस्मात् समाचरेत् । यथा यथा प्रदीयन्ते पुटाः सुबहुशो यदि ॥२१॥ तथा तथा प्रकुर्वन्ति गुणानेव सहस्रशः । पुटपाकेन पक्वन्तु शस्यते रसकर्मसु ॥ २२ ॥ स्थालीपाकमें पके हुए लोहको स्वच्छ जलसे धोकर ऊपर नितरे हुए जलको फेंक दे और लोहको सुखाकर बारीक चूर्ण करे । ( फिर इस चूर्णमें आगे लिखे मारकद्रव्योंका रस डालकर रगड़े सूखनेपर संपुटमें रख पुटमें फूंक दे ) इस प्रकार पुट देनेसे लोहके सब दोष दूर होजाते हैं और बहुतसे गुण इससे प्रगट होजाते हैं एवं पुट देनेसेही लोहकी उत्तम भस्म होती है । जैसे२ लोहको बहुतसी पुटें दी जावें वैसे २ ही लोह सहस्रोंगुणोंके करनेवाला होता जाता है। पुटपाकसे भस्म हुआ लोहाही रसकर्म और रसायनकर्ममें प्रशंसनीय होता है ॥ ३२०-२२ ॥ पुटोंकी संख्या । दशादिशतपर्यन्तो गदे पुटविधिर्मतः ।