रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ८२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । शतादिस्तु सहस्रान्तः पुटो देयो रसायने ॥ वाजीकर्मणि विज्ञेयो दशादिशतपंचकः ॥ २३ ॥ रोगनाशके लिये लोहभस्म बनाना हो तो दशसे सौ तक पुटें देनी चाहिये । दश पुटसे कम अग्निसे बनाया लोह उत्तम गुणकारी नहीं होता । रसायन कर्ममें सौ पुटसे सहस्र पुटतक दिया हुआ लोहभस्म अच्छा होता है। वाजीकर्ममें (स्त्रीगमनकी शक्ति बढ़ानेको) दशसे पांचसौतक पुट दिया हुआ गुणकारी होता है ॥ २३ ॥ सामान्य पुटोंका नियम । तावदेव पुटेल्लोहं यावच्चूर्णीकृतं जले । निस्तरंगे लघुत्वेन समुत्तरति हंसवत् ॥ २४ ॥ लोहको तबतक पुटें देकर चूर्ण करता जाय जबतक वह भस्म बन- कर स्वच्छ टिके हुए जलपर हंसके समान तैरने न लगे, जब जलपर तैरते हुए लोहकी भस्ममेंसे जलमें कोई सूक्ष्म कण भी डूबता हुआ दिखाई न दे तो लोहको भस्म हुआ जानना ॥ २४ ॥ पुटपाकमें औषधियोंका प्रयोग । पुटपाकौषधस्यापि क्वाथो वा स्वरसोऽपिवा । वक्ष्यमाणप्रमाणे कर्त्तव्यो भिषजां वरैः ॥२५॥ पुटपाकमें आगे कहे हुए द्रव्योंमेंसे जिसका स्वरस या क्वाथ डालना हो वह आगे कहे विधानसे डालकर श्रेष्ठ वैद्य विधिवत् पुटें देवे ॥ २५॥ रसाभावे तु सर्वेषां क्वाथो ग्राह्यो मनीषिभिः । अभावे स्वरसस्यापि क्वाथ एव फलत्रिकात् ॥२६॥ जिस द्रव्यका स्वरस न मिल सके उसका क्वाथ बनाकर डाले, यदि त्रिफलेका स्वरस न मिले तो वैद्यको उचित है कि त्रिफलेका भी क्वाथ ही डाले ॥ २६ ॥