भारतकोश
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रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

( ८२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । शतादिस्तु सहस्रान्तः पुटो देयो रसायने ॥ वाजीकर्मणि विज्ञेयो दशादिशतपंचकः ॥ २३ ॥ रोगनाशके लिये लोहभस्म बनाना हो तो दशसे सौ तक पुटें देनी चाहिये । दश पुटसे कम अग्निसे बनाया लोह उत्तम गुणकारी नहीं होता । रसायन कर्ममें सौ पुटसे सहस्र पुटतक दिया हुआ लोहभस्म अच्छा होता है। वाजीकर्ममें (स्त्रीगमनकी शक्ति बढ़ानेको) दशसे पांचसौतक पुट दिया हुआ गुणकारी होता है ॥ २३ ॥ सामान्य पुटोंका नियम । तावदेव पुटेल्लोहं यावच्चूर्णीकृतं जले । निस्तरंगे लघुत्वेन समुत्तरति हंसवत् ॥ २४ ॥ लोहको तबतक पुटें देकर चूर्ण करता जाय जबतक वह भस्म बन- कर स्वच्छ टिके हुए जलपर हंसके समान तैरने न लगे, जब जलपर तैरते हुए लोहकी भस्ममेंसे जलमें कोई सूक्ष्म कण भी डूबता हुआ दिखाई न दे तो लोहको भस्म हुआ जानना ॥ २४ ॥ पुटपाकमें औषधियोंका प्रयोग । पुटपाकौषधस्यापि क्वाथो वा स्वरसोऽपिवा । वक्ष्यमाणप्रमाणे कर्त्तव्यो भिषजां वरैः ॥२५॥ पुटपाकमें आगे कहे हुए द्रव्योंमेंसे जिसका स्वरस या क्वाथ डालना हो वह आगे कहे विधानसे डालकर श्रेष्ठ वैद्य विधिवत् पुटें देवे ॥ २५॥ रसाभावे तु सर्वेषां क्वाथो ग्राह्यो मनीषिभिः । अभावे स्वरसस्यापि क्वाथ एव फलत्रिकात् ॥२६॥ जिस द्रव्यका स्वरस न मिल सके उसका क्वाथ बनाकर डाले, यदि त्रिफलेका स्वरस न मिले तो वैद्यको उचित है कि त्रिफलेका भी क्वाथ ही डाले ॥ २६ ॥

भाषाटीकासहित । ( ८३ ) त्रिफलादिगण । त्रिफलात्रिवृतादन्तीकटुकीतालमूलिकाः । वृद्धदारकवृश्चीरवृषपत्रकचित्रकाः ॥ २७ ॥ शृंगवेरविडङ्गौ च भृंगभल्लातकौषधम् । दाडिमस्य च पत्राणि शतपत्री पुनर्नवा ॥ २८ ॥ कुठेरक्रामुकौ कन्दः तन्त्रीभेकस्य पर्णिका । हस्तिकर्णः पलाशश्च कुलिशः केशराजकः ॥ २९ ॥ माणः खण्डितकर्णश्च गोजिह्वालोहमारकः । गिरिशान्तनकः प्रोक्तस्त्रिफलादिरयं गणः ॥३०॥ सामान्यपुटपाकार्थमेतानिच्छन्ति सूरयः ॥ ३१ ॥ त्रिफला, निशोथ, दंती, कुटकी, तालमूली ( मुसली ), विधायरा, श्वेतपुनर्नवा, अडूसा, पत्रज, चित्रक, अदरख, वायविडंग, भांगरा, भिलावे, सोंठ, दाडिमके पत्र, शतावरी, लालपुनर्नवा, कुठेर ( तुलसी ), सुपारीकी जड, जिमीकंद, तंत्री ( गिलोय ), मण्डूकपर्णी, हस्तिकर्ण- पालाश, ( बड़ेपत्तेका ढाक), हडसंहारी, भांगरा, मानकंद, खंडितकर्ण, ( सकरकंदके समान कंद ), गोजियाघास और अपराजिता यह लोह- मारकगण हैं, इसीको त्रिफलादिगण भी कहते हैं । सामान्यतासे सर्व- रोग नाशार्थ लोहपुटपाक करनेके लिये इस मारणगणको बुद्धिमान् वैद्योंने श्रेष्ठ माना है ॥ २७-३१ ॥ वातनाशक एरंडादिगण । विशेषपुटपाकाय गणानन्याञ्छृणूदितान् । एरण्डशारिवाद्राक्षाशिरीषाश्च प्रसारणी ॥ ३२ ॥ १ कोई 'वृषपत्रक' शब्दको इकट्ठा लेकर छागलांत्री नामक वनौषधी अर्थ करते हैं । यदि वृषपत्रकका छागलांत्री अर्थ करे तो लोहमारकका शांतिशाक अर्थ कर लेना चाहिये ।

( ९४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । माषमुद्गाख्यपर्पिन्त्यौ विदारीकन्दकेतकी । एरण्डादिगणो ह्येष सर्ववातविकारनुत् ॥ ३३ ॥ अब वातादि दोष विशेषपर पुटपाकके लिये कहे हुए इन गणोंको श्रवण करो । एरण्डकी जड, शारिवा, द्राक्षा, शिरीष, प्रसारणी, माष- पर्णी, मुद्गपर्णी, विदारीकंद और केतकी यह एरण्डादि गण संपूर्ण वातविकारोंको नष्ट करता है । ( यदि वातविकार शांतिके लिये लोह- भस्म करना हो तो इस एरण्डादि गणसे पुट देना चाहिये ) ॥ ३२-३३ ॥ किरातादि गण । किरातममृतानिम्बकुस्तुम्बुरुशतावरी । पटोलं चन्दनं पद्मं शाल्मल्यौडुम्बुरी जटा । पैत्तिकामयहन्ताऽयं किरातादिगणो मतः ॥ ३४ ॥ चिरायता, गिलोय, नीम, धनियाँ, शतावर, पटोल, चंदन, पद्म, सेमलकी जड और गूंलरंकी जड यह किरातादि गण पित्तविकारोंको नष्ट करनेमें श्रेष्ठ है । ( इसलिये पित्तरोग दूर करनेको इसकी पुटें देना चाहिये ) ॥ ३४ ॥ शृंगवेरादि गण । शृङ्गवेरस्य मूलानि निर्गुण्डीकौटजं फलम् । करञ्जद्वितयं मूर्वा शोभाञ्जनशिरीषकौ ॥ ३५ ॥ वरुणश्चार्कपर्णञ्च पटोलं कण्टकारिका । शृङ्गवेरादिको ह्येष गणः श्लेष्मगदापहः ॥ ३६ ॥ अदरख, संभालू, इंद्रजौ, करंज, पूतिकरंज, मूर्वा, सुहांजना, शिरीष, वरुणवृक्ष, आकके पत्र, पटोलपत्र और कटेली यह शृंगवेरादि गण कफके विकारोंको दूर करता है । ( कफके रोग दूर करनेकी लिये लोहमें इसकी पुटें देनी चाहिये ) ॥ ३५ ॥ ३६ ॥ गोक्षुरादि गण । गोक्षुरक्षुरकौ व्याघ्री सिंहपुच्छीद्वयं स्थिरा । गोक्षुरादिरिति प्रोक्तो वातश्लेष्महरो गणः ॥ ३७ ॥

inदोषत्रयहरो! Look at the word ह्येष: +with! * In line 15: ह्येषhaswith! * Look at कुम्हेर? No, it's . Let's just output what is visually there: कुम्भीर? No, कुम्भार? No, कुम्हेर? * Wait, let's look at the word: "कुम्हेर" is the actual Hindi name of Kashmari! But why does it look like ? * Wait, does कुम्हेरexist in Hindi? YES, Kumher (कुम्हेर) is the Hindi name for Gambhari! But wait, isकुम्भीरalso used? No, Gambhari is called "कुम्हार" or "खम्भार" or "कुम्हेर". If someone spelled "Kumbher", in Devanagari it is कुम्भीर? No, कुम्हेर or कुम्भीर! If spelled with, it's कुम्भीर? No, with andit is कु-म्-भे-र. * Wait, let's look at the image: is it? * Look at inमाषपर्णी(line 2):thenप` then

( ८६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । गण वाजीकरणमें श्रेष्ठ है । ( यदि नपुंसकता दूर करने या कामशक्ति बढ़ानेको लोह भस्म करना हो तो इस गणसे पुटें दे ) ॥ ४१ ॥ विदारीकंदादि गण। विदारीकन्दपिण्डाह्वभृङ्गराजशतावरी । क्षीरकञ्चुकभल्लातामृतकाचित्रकैस्तथा ॥ ४२ ॥ करिकर्णपलाशैश्च मूसलीमधुकैरपि । मुण्डिरीकेशराजैश्च पुटो देयो रसायने ॥ ४३ ॥ विदारीकंद, पिण्डाह्व ( शिलारस ), आंगरा, शतावरी, क्षीरकञ्चुकी, भिलावे, गिलोय, चित्रक, बड़ेपत्रका ढाक, मुसली, मुलैठी, गोरख- मुण्डी और केशराज इसको विदारीकंदादि गण कहते हैं । रसायनार्थ इन द्रव्योंसे पुट देना चाहिये ॥ ४२ ॥ ४३ ॥ सामान्ये च विशेषे च पुटे यद्यत्प्रकीर्तितम् । मिलितैरेकशो वा तैर्यथेष्टं पुटयेत्ततः । पुटपाके फलादीनामयसा ग्रहणं समम् ॥ ४४ ॥ ऊपर कहे सामान्य (त्रिफलादि) गणकी या विशेष एरण्डादि गणकी जिस जिसकी पुट देनी हो उस गणकी सब औषधियोंको इकट्ठाकर वा अलग अलग लेकर जैसा उचित हो वैसे द्रव्योंका स्वरस या काथ लोहचूर्णके बराबर डालकर खरल कर सुखाले,फिर संपुटमें रख कपड- मिट्टीसे संधान कर पुटमें फूंक दे,पुटपाकमें त्रिफलादि जो द्रव्य मिलाने हों लोहचूर्णके समान मिलाने चाहिये ॥ ४४ ॥ पुटपाकविधान । हस्तमात्रमिते गर्ते करीषेणार्द्धपूरिते । अथवा तुषकाष्ठाभ्यां पूरितेऽर्द्धे निधापयेत् ॥ ४५ ॥ लोहमग्निं ततो दत्त्वा तथैवोर्द्धं प्रपूरयेत् ।

भाषाटीकासहित । ( ८७ ) दिवा वा यदि वा रात्रौ विधिनानेन पाचकः । चतुर्भिः प्रहरैरेवं पुटपाकेन मारयेत् ॥ ४६ ॥ एक हाथका गहरा, चौड़ा, गोल गढ़ा खोदे; उसमें आधे भाग- तक एरने उपले अथवा तुष और काष्ठ भर दे फिर लोहेके चूर्णका संपुट रख अग्नि गेरे और ऊपरले आधे भागको भी पूर्ववत् उपलोंसे या काष्ठादिसे भर दे । इसप्रकार रात्रिको अथवा दिनमें पुट देवे, चार प्रहरतक इसी तरह रहने दे फिर स्वांग शीतल होनेपर निकाल ले । ( संपुट खोलकर बीचमेंसे लोह निकाल जिस द्रव्यकी पुट देनी हो उसके रसमें रगड़कर सुखा ले फिर इसी प्रकार पुट दे ) ॥४५॥४६॥ पुटमें दोष । पुटपाके क्षणादूर्ध्वं स्थितो भवति भस्मसात् । अधस्तादपकृष्टस्तु मन्दो भवति वीर्यतः ॥ ४७ ॥ कुण्डस्थो भस्मनाच्छन्न आक्रष्टव्यः सुशीतलः । समाकृष्टस्य तप्तस्य गुणहानिः प्रजायते ॥ ४८ ॥ यदि पुटको पहले ही भरकर ऊपर संपुट रक्खे तो संपुटमें जो द्रव्य हो उसकी शीघ्र ही निस्सारभस्म होजाती है ( या द्रव्य उड़ जाता है ) और पुटमें नीचे ही संपुटको रख देनेसे मन्द वीर्य हो जाता है इसलिये संपुटको पुटके मध्यमें रखना चाहिये । जब पुट स्वांग शीतल होजाये तो निकाल ले गरमको न निकाले, गरम निकालनेसे गुण नष्ट होजाता है ॥ ४७ ॥ ४८ ॥ अन्य प्रकारसे लोह मारण । शुद्धस्य सूतराजस्य भागो भागद्वयं बलेः । द्वयोः समं लोहचूर्णं मर्दयेत्कन्यकाद्रवैः ॥ ४९ ॥ यामद्वयं ततो गोलं स्थापयेत्ताम्रभाजने । आच्छाद्यैरण्डजैः पत्रैरुष्णो यामद्वयाद्भवेत्॥३५०॥

( ८८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । त्रिरात्रं धान्यराशिस्थं तत्ततो मर्दयेद्दृढम् । रजस्तद्वस्त्रगलितं नीरे तरति हंसवत् ॥ तीक्ष्णं मुण्डं कान्तलोहं निरुत्थं जायते मृतम्॥५१॥ शुद्ध पारा एक भाग, शुद्ध आमलासार गंधक दो भाग इन दोनोंके बराबर उपरोक्त विधिसे शुद्ध किया लोह चूर्ण ले, पहिले पारे गंधकको रगड़कर कजली करे फिर इसमें लोहचूर्ण मिला घीकुमारके रसमें दो पहर रगड़कर गोला बनावे इस गोलेको तांबेके पात्रमें रख दो पहरकी अग्नि देवे ( इस पात्रको चूल्हेपर चढ़ा कर नीचे दो पहर तीक्ष्ण अग्नि जलावे । कोई इसको पुटमें फूंकना मानते हैं परन्तु मूलपाठसे पुटमें फूंकनेका अर्थ नहीं निकलता, कोई कोई पुरुष तीक्ष्ण धूपमें दो पहर रखना ऐसा अर्थ करते हैं, हमारी रायमें दो पहरकी अग्नि देना ठीक है अथवा दो पहर घीकुमारमें रगड़कर पुट देना भी ठीक है ) फिर शीतल होनेपर पात्रमेंसे लोहचूर्णके गोलेको निकाल एरंडके पत्रोंसे लपेट धान्योंकी राशिमें तीन दिन पर्यन्त दबाये रक्खे चौथे दिन निकालकर खरलमें डाल बारीक चूर्ण करे और वस्त्रद्वारा छानकर पानीपर तैरावे ( जबतक पानीपर तैरनेवाली उत्तम भस्म न बने तब- तक इसी विधानसे पारे गंधकके संयोगसे गोला बनाकर दो प्रहरकी अग्नि या पुट दे धान्यके ढेरमें दबाकर चूर्ण करता रहे, जब हंसके समान तैरनेवाली होजाय तो शुद्ध भस्म जाने ) इस प्रकार तीक्ष्णलोह वा मुण्डलोह, या कांतलोह इनमेंसे कोई भी लोह हो उसकी उत्तम निरुत्थ भस्म होजाती है ॥ ४९-५१ ॥ द्वादशांशेन दरदं तीक्ष्णचूर्णस्य मेलयेत् । कन्यानीरेण संमर्द्य यामयुग्मञ्च संपुटेत् । एवं सप्तपुटे मृत्युं लोहचूर्णमवाप्नुयात् ॥ ५२ ॥ अन्य प्रकार—शुद्ध लोहचूर्णमें बारहवां भाग सिंगरफ मिलाकर दो पहर तक घीकुमारके रसमें खूब रगड़े फिर संपुटमें रख पुटमें फूंक दे इसप्रकार सात पुटें देनेसे लोहेकी उत्तम भस्म होजाती है ॥ ५२ ॥

भाषाटीकासहित । ( ८९ ) निरुत्थ भस्मकी परीक्षा । सर्वमेतन्मृतं लोहं पक्तव्यं मित्रपञ्चकैः । यद्येवं स्यान्निरुत्थञ्च सेव्यं रक्तिचतुष्टयम् ॥ ५३ ॥ सब प्रकारके मृत लोहोंको मित्रपंचकमें मिलाकर कोयलोंकी अग्निमें तपावे यदि इस प्रकार तीक्ष्णाग्नि देनेसे भस्म जैसी डाली थी वैसाही रहे तो निरुत्थ भस्म जाने, निरुत्थ भस्म हो तो इसको चार रत्ती मात्रा तक सेवन कर सकते हैं (यदि वही धातु जी जावे तो उसे न खावे फिर पूर्ववत् पुटें देवे जब निरुत्थ हो जाये तो सेवन करे) ५३॥ मित्रपंचक । मधु सर्पिस्तथा गुञ्जा टंकणं गुग्गुलुस्तथा । मित्रपञ्चकमेतच्च गदितं धातुमेलने ॥ ५४ ॥ शहद, घी, रत्तकें, सुहागा और गुग्गुल इन पांच द्रव्योंको मित्रपञ्चक कहते हैं, इस मित्रपञ्चकमें मिलाकर धमानेसे जो धातु फूंकनेमें कच्ची रहगई हो वह जी उठती है अर्थात् फिर वैसी ही बन जाती है ॥ ५४ ॥ अन्य प्रकारसे परीक्षा । गोघृतं गन्धकं लोहं तप्तखल्ले विमर्दयेत् । दिनैकं कन्यकाद्रावै रुद्ध्वा गजपुटे पचेत् ॥ इत्येवं सर्वलोहानां कर्त्तव्यं स्यान्निरुत्थितम् ॥५५॥ गोघृत, गंधक और लोहभस्म इनको घीकुमारके रससे तप्त खल्वमें एक दिन मर्दन कर संपुटमें रख गजपुटमें फूंक दे । शीतल होनेपर निकाले यदि निरुत्थ भस्म हो तो सेवन करे । इस प्रकार सब प्रकारके लोहोंकी परीक्षा करनी चाहिये ॥ ५५ ॥ घृतमधुगुञ्जाटंकणैःसमं लोहभस्म मर्दयेच्च विचक्षणः। धमेद्बह्नौ पुनर्लोहं तदा योज्यं रसायने ॥ ५६ ॥

( ९० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अन्य मत—घी, शहद, रत्तकें और सुहागा इनकी बराबर लोहभस्म डालकर मर्दन करे फिर मूषामें या संपुटमें रख कोयलोंकी अग्निमें धौंकनीसे धमावे यदि भस्म निरुत्थ रहे तो रसायनकर्ममें आयुवृद्धिके लिये प्रयोग करे ॥ ५६ ॥ लोहभस्मके गुण । कृष्णायःशोथशूलार्शःक्रिमिपाण्डुत्वशोषनुत् । वयस्यं गुरु चक्षुष्यं सर्वमेदोऽनिलापहम् ॥५७॥ आयुःप्रदाता बलवीर्यकर्त्ता रोगापहर्त्ता मदनस्य कर्त्ता । अयःसमानं नहि किञ्चिदस्ति रसायनं श्रेष्ठतमं नराणाम् ॥ ५८ ॥ लोहभस्म-सूजन, शूल, अर्श, क्रिमिरोग, पाण्डुरोग और शोष रोगको नष्ट करनेवाली है तथा अवस्थास्थापक, भारी, नेत्रोंको हितकारी, सब प्रकारके मेदरोग और वातरोगोंको दूर करती है । एवं आयुको देनेवाली, बलकारक, वीर्यवर्द्धक, रोगनाशक और कामशक्तिवर्द्धक है, मनुष्योंके लिये लोहभस्मके समान और कोई भी रसायन उत्तम नहीं है ॥ ५७ ॥ ५८ ॥ लोहसेवनमें कुपथ्य । कूष्माण्डं तिलतैलञ्च रसोनं राजिकां तथा । मद्यमम्लरसञ्चैव त्यजेल्लोहस्य सेवकः ॥ ५९ ॥ पेठा, तिलतेल, लहसुन, राई, मद्य और खट्टे रसवाले पदार्थ इन सबको लोहभस्मको खानेवाला मनुष्य त्याग देवे ॥ ५९ ॥ जातिभेदसे लोहके गुणोंमें न्यूनाधिकता । सामान्याद्विगुणं क्रौञ्चं कालिङ्गोऽष्टगुणस्ततः । कलेः शतगुणं भद्रं भद्राद्वज्रं सहस्रधा ॥ ३६० ॥

भाषाटीकासहित । ( ९१ ) वज्राच्छतगुणं पाण्डि निरङ्गं दशभिर्गुणैः । ततः कोटिसहस्रैर्वा कान्तलोहं महागुणम् ॥ ६१ ॥ सामान्य लोहसे क्रौञ्चलोह गुणमें दोगुणा अधिक गुणकारी है । क्रौंचसे कालिंगलोह आठगुणा गुण करता है । कालिंगेसे भद्रलोह सौगुणा गुणकारी है । भद्रसे वज्रलोह सहस्रगुणा, वज्रसे पाण्ड्य लोह सौगुणा गुणमें अधिक है. एवं पाण्ड्य लोहसे दशगुणा निरंग और निरंगसे भी सहस्रों करोडों गुणा अधिक गुणकारी कांतलोह होता है इसलिये कांतलोह सब लोहोंमें महागुणकारी होता है ॥३६०॥६१॥ इति लोह मारण । मण्डूर शोधन । ये गुणा मारिते मुण्डे ते गुणा मुण्डकिट्टेके । तस्मात्सर्वत्र मण्डूरं रोगशान्त्यै प्रयोजयेत् ॥ ६२ ॥ जो गुण मारे हुए लोहमें होते हैं वही गुण लोहकिट्टमें भी होते हैं। इसलिये लोहभस्मके अभावमें लोहकिट्ट ( मण्डूरकी ) भस्मका संपूर्ण रोगोंकी शांतिके लिये प्रयोग करना चाहिये ॥ ६२ ॥ मण्डूरके गुण । शतोर्ध्वमुत्तमं किट्टं मध्यञ्चाशीतिवार्षिकम् । अधमं षष्टिवर्षीयं ततो हीनं विषोपमम् ॥ ६३ ॥ यदि १०० सौ वर्षका पुराना मण्डूर हो तो गुणमें उत्तम होता है । ८० अस्सी वर्षका पुराना मण्डूर मध्यम होता है और साठ ६० वर्षका पुराना अधम होता है, यदि साठ वर्षसे कम पुराना मण्डूर हो तो वह विषके समान जानना, इसलिये अत्यंत पुराना मण्डूर लेकर मारना चाहिये ॥ ६३ ॥

( ९२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । मण्डूर मारण । दग्ध्वाक्षकाष्ठैर्मलमायसन्तु गोमूत्रनिर्वापितमष्ट- वारान् । विचूर्ण्य लीढं मधुना चिरेण कुम्भाह्वयं पाण्डुगदं निहन्ति ॥ ६४ ॥ लोहकिट्टको बहेड़ेकी लकड़ियोंकी अग्निमें तपा २ कर गोमूत्रमें बुझावे, इस प्रकार आठ वार बुझानेसे मण्डूर मर जाता है, इसको पीसकर शहदके साथ चाटनेसे कुम्भकामला और पाण्डुरोग दूर होते हैं ॥ ६४॥ गुणाधिक्य । किट्टाद्दशगुणं मुण्डं मुण्डात्तीक्ष्णं शताधिकम् । तीक्ष्णाल्लक्षगुणं कान्तं भक्षणात्कुरुते गुणम् ॥ ६५ ॥ मण्डूरसे मुण्डूरलोहभस्म दशगुणा गुण करती है । मुण्डलोहसे तीक्ष्ण लोहभस्म सौगुणा अधिक गुण करती है। एवं कांतभस्मके खानेसे तीक्ष्ण लोहभस्मसे लक्षगुणा अधिक गुण होता है ॥ ६५ ॥ इति किट्ट शोधनविधि । सुवर्णादि धातुओंके साधारण मारक द्रव्य । नागैः सुवर्णं रजतञ्च ताप्यैर्गन्धेन ताम्रं शिलया च नागम् । तालेन वङ्गं त्रिविधञ्च लोहं नारीपयो हन्ति च हिङ्गुलेन ॥ ६६ ॥ नाग ( सिक्का ) के संयोगसे पुटें देनेसे सुवर्णकी भस्म होजाती है । सोनामाक्खीसे चांदीकी भस्म होजाती है । गंधकके संग पुटें देनेसे ताम्बेकी भस्म होजाती है । मनसिलके साथ पुटें देनेसे सिक्केकी भस्म होजाती है, एवं हरितालसे वंगकी भस्म होजाती है और सिंगरफ तथा स्त्रीका दूध मिलाकर पुटें देनेसे सब प्रकारके लोहोंकी भस्म होजाती है । ( इन द्रव्योंमें रगड़ रगड़ कर पुटोंमें फूंकनेसे भस्म होजाती है ) ॥ ६६ ॥ इति स्वर्णादि धातु शोधन मारण ।

भाषाटीकासहित । ( ९३ ) मणियुक्तादिरत्नशोधन मारण । स्वेदयेद्दोलिकायन्त्रे जयन्त्याः स्वरसेन च । मणिमुक्ताप्रवालानि यामैकेन च शोधयेत् ॥ ६७ ॥ मणियाँ, मोती और मूंगे इनमेंसे जिसको शुद्ध करना हो उसे वस्त्रमें पोटली बांधकर जयंतीके स्वरसमें एक प्रहर दोलायंत्रकी विधिसे पकावे तो मणि, मुक्ता और प्रवाल शुद्ध होजाते हैं ॥ ६७ ॥ मोतियोंका मारण । मुक्ताफलानि शुद्धानि खल्ले पिष्ट्वा पुटेल्लघु । एवं भस्मत्वमाप्नोति वज्रकं काञ्जियोगतः ॥ ६८ ॥ शुद्ध मोती लेकर खरलमें पीसकर लघुपुटमें फूंक दे तो मोतियोंकी भस्म होजाती है । यदि वज्रकी भस्म करनी हो तो कांजीके संयोगसे करे अर्थात् वज्रको शुद्ध करके तपा तपा कर कांजीमें बुझावे, फिर कांजीमें पीसकर पुट देनेसे वज्र ( हीरा ) की भस्म होजाती है ॥६८॥ अन्य प्रकारसे रत्नमारण । कुमार्या तण्डुलीयेन तुल्येन च निषेचयेत् । प्रत्येकं सप्तवारांश्च तप्ततप्तानि कृत्स्नशः ॥ ६९ ॥ मौक्तिकानि प्रवालानि तथा रत्नान्यशेषतः । क्षणाद्विविधवर्णानि म्रियन्ते नात्र संशयः ॥३७०॥ मोती, मूंगा या अन्य सब प्रकारके रत्न तीक्ष्णाग्निमें तपा २ कर समभाग घीकुवारके रस तथा चौलाईके रसमें सात २ बार बुझानेसे अवश्य मर जाते हैं । ( जिस रत्नकी भस्म करनी हो उसको अग्निमें लाल कर बराबरके घीकुवारके रससे बुझावे, ऐसे सात बार घीकुवारके रससे और सात बार चौलाईके रससे बुझावे तो मोती आदि सब रत्नोंकी भस्म होजाती है ) ॥ ६९ ॥ ३७० ॥

( ९४ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । प्रवालमारण । स्त्रीदुग्धेन प्रवालञ्च भावयित्वा तु हण्डिके । मध्येऽपि तक्रसहितं स्थापयेत्तां निरोधयेत् । चूल्ह्यामग्निप्रतापेन म्रियते प्रहरद्वये ॥ ७१ ॥ प्रवाल (मूँगे) को स्त्रीके दूधमें भिगोकर सुखा ले फिर एक हांडीमें नीचे ऊपर तक ( मट्ठा ) डालकर बीचमें मूँगा रख हांडीका मुख बंद करके चूल्हेपर चढ़ा नीचे दो पहरकी तीक्ष्णाग्नि देवे तो मूँगोंकी भस्म होजाती है ॥ ७१ ॥ सब रत्न और मणियोंका शोधन । कुलत्थस्य पलशतं वारिद्रोणेन पाचयेत् । तस्मिन्पादावशेषे च क्वाथेऽष्टौ मणयःशिलाः॥७२॥ आतपे त्रिदिनं शोध्याः क्वाथसिक्ताः पुनः पुनः । शुद्ध्यन्ते सर्वरत्नानि मणयश्च न संशयः॥ ७३ ॥ सौ पल कुलथीको एक द्रोण पानीमें पकावे चौथा भाग शेष रहनेपर उतारकर छान ले, इस क्वाथसे मणि मुक्ता आदिको बार २ सेचन कर तीन दिन धूपमें रक्खे तो श्वेत, रक्त, नीलादि मणियाँ मोती आदि रत्न और मनशिल यह सब शुद्ध हो जाते हैं इसमें संशय नहीं । तात्पर्य्य यह हुआ कि, जिस रत्नको शोधन करना हो उसको पात्रमें डाल धूपमें रक्खे और बार २ कुलथीके क्वाथसे सींचता रहे, इस प्रकार तीन दिन धूपमें रखनेसे रत्न अवश्य शुद्ध होजायगा ॥७२--७३॥ इति मुक्तादि शोधन मारण । विषका शोधन मारण । कृत्वा चणकसंस्थानं गोमूत्रैर्भावयेत्त्र्यहम् । समटङ्कणसंपिष्टं मृतमित्युच्यते विषम् ॥ ७४ ॥

भाषाटीकासहित । (९५) सिंगियाविष ( तेलिया मिट्टी या बच्छनाग ) लेकर उसके चणेके समान छोटे २ टुकडे करे, इनको तीन दिन गोमूत्रमें भिगोकर रक्खे चौथे दिन निकाल कर समभाग सुहागा डालकर पीस ले, जब सूख जाये तो सिंगिये विषको मरा हुआ ( या शुद्ध ) जानना, यह औषधि- योंमें मिलाने योग्य शुद्ध विष होजाता है ॥ ७४ ॥ अन्यप्रकारसे विषशोधन । अथवा त्रैफले क्वाथे विषं शुद्धयति पाचितम् । दोलायां त्रिफलाक्वाथे छागीक्षीरे च पाचितम्॥७५॥ त्रिफलेके क्वाथमें दोलायन्त्र द्वारा चार पहर पकानेसे भी विष शुद्ध होजाता है । अथवा बकरीके दूधमें दोलायन्त्र द्वारा चार पहर पकावे तो विष शुद्ध होजाता है ॥ ७५ ॥ गोमूत्रपूर्णपात्रे च दोलायन्त्रे विषं पचेत् । दशतोलकमानेन चादौ वैद्यो दिवानिशम् ॥ ७६ ॥ अथवा दश तोला विषके छोटे २ ठुकडे कर पोटलीमें बांध गोमू- त्रसे भरे पात्रमें एक दिन रात दोलायन्त्रकी विधिसे पकावे, फिर निकाल गर्म जलसे धोकर सुखा ले तो विष शुद्ध होजाता है ॥ ७६ ॥ विषभागाँश्चणकवत्स्थूलान्कृत्वा तु भाजने । तत्र गोमूत्रकं दत्त्वा प्रत्यहं नित्यनूतनम् ॥ ७७ ॥ शोषयेन्त्रिदिनादूर्ध्वं धृत्वा तीव्रातपे ततः । प्रयोगेषु प्रयुञ्जीत भागमानेन तद्विधम् ॥ ७८ ॥ अथवा विषको चनेके समान छोटा छोटा करके मट्टीके पात्रमें रक्खे इसमें गोमूत्र डाल दे और एक दिन रक्खा रहने दे, दूसरे दिन पहला गोमूत्र निकालकर फेंक दे और नवीन ( ताजा ) गोमूत्र उसमें

( ९६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । डाल दे, इसप्रकार तीन दिन करे फिर निकालकर तीव्र धूपमें सुखा ले। इसप्रकार शोधन किया विष जिस योगमें जितना डालना लिखा हो उतना डाले ॥ ७७ ॥ ७८ ॥ इति विष शोधन ॥ सात उपविष । अर्कस्सेहुण्डधत्तूरलाङ्गलीकरवीरकाः । गुञ्जाहिफेनावित्येताः सप्तोपविषजातयः ॥ ७९ ॥ आक, थोहर, धतूरा, लांगलीकंद, कनेर, गुंजा ( रत्तक ) और अफीम यह सात उपविषोंकी जातियां हैं ॥ ७९ ॥ उपविष शोधन । धत्तूरस्य च यद्बीजमन्यच्चोपविषं च यत् । तच्छोध्यं दोलिकायन्त्रे क्षीरपूर्णेऽथ पात्रके ॥३८० धतूरेके बीज या अन्य उपविष जो शोधन करना हो उसको पोटलीमें बांध दुग्धयुक्त पात्रमें लटका दोलायन्त्रविधिसे पकावे तो शुद्ध होजाते हैं ॥ ३८० ॥ जमालगोटेका शोधन । निस्तुषं जयपालश्च द्विधा कृत्वा विचक्षणः । एतद्बीजस्य मध्यन्तु पत्रवत्परिवर्जयेत् ॥ ८१ ॥ अष्टमांशेन चूर्णेन टङ्कणस्य च मेलयेत् । त्रिरात्रं गोमये क्षिप्त्वा पाच्यं दुग्धेन संप्लुतम् । एवं वै शुद्धिमायाति जैपालममृतोपमम् ॥ ८२ ॥ जमालगोटेके छिलके दूर कर उनकी गिरीकी दो दो दालसी काट- कर अन्दरसे सफेद पत्ती ( जीभी ) दूर कर दे, फिर इनमें आठवां भाग सुहागा मिलाकर पोटली बांध गायके गोबरमें डुबोकर रक्खे तीन दिनके बाद निकाल कर गरम पानीसे धो डाले, फिर पोटलीमें

भाषाटीकासहित । ( ९७ ) बांध दोलायन्त्रविधिसे गोदूधमें पकावे फिर निकाल करके खरलमें बारीक रगडे ( फिर इस कल्कको मिट्टीके ठीकरों या शरावोंपर लेप- कर धूपमें सुखावे जिससे सब चिकनाई शराव शोषण कर ले फिर शरावोंपरसे उतार ले ) यह जमालगोटे शुद्ध और अमृतके समान गुण कारी होते हैं । जिस योगमें जमालगोटे डालने हों यह डालने चाहिये ॥ ३८१ ॥ ३८२ ॥ इति जैपाल शुद्धि ॥ अन्य मतसे जैपालादि बीजोंका शोधन । मूलक्वाथैः कुमार्याश्च जैपालबीजशोधनम् । इन्द्रवारुणिकाक्वाथै राजवृक्षस्य बीजकम् ॥ ८३ ॥ समूलोत्तरवारुण्या धुस्तूरबीजशोधनम् । धात्रीफलरसेनैव पलाशबीजशोधनम् ॥ ८४ ॥ जमालगोटोंकी पत्ती निकाल पोटलीमें बांध घीकुवारकी जड़के क्वाथमें पकावे तो शुद्ध होजाते हैं । अमलतासके बीज इन्द्रायणके क्वाथमें शुद्ध होजाते हैं । ऐसे ही जडसहित इंद्रायणके काथमें धतू- रेके बीज शुद्ध होजाते हैं । आमलेके रसकी भावना देनेसे ढाकके बीज शुद्ध होजाते हैं ॥ ८३ ॥ ८४ ॥ थोहरके दूधका शोधन । चिञ्चापत्ररसे कर्षे वस्त्रपूते पलद्वयम् । स्नुहीक्षीरं रौद्रयन्त्रे भावयेद्यत्नतः सुधीः । द्रवे शुष्के समुत्तार्य सर्वयोगेषु योजयेत् ॥ ८५ ॥ इमलीके पत्रोंका स्वरस वस्त्रसे छना हुआ एक तोला, थोहरका दूध दश तोला इन दोनोंको मिट्टीके कपालमें डाल अग्निपर चढ़ावे जब थोहरके दूधका पतलापन दूर होकर दूध सूख जावे तो उतार ले । यह दूध शुद्ध और विरेचक योगमें डालने योग्य होजाता है ॥ ८५ ॥

( ९८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । जलौका ( जोंक ) शोधनविधि । चिरन्तनां जलौकान्तु ताम्रपात्रेषु रक्षयेत् । चतुर्माषं निशाचूर्णं जलाष्टकपले क्षिपेत् ॥ ८६ ॥ तस्मिन् क्षिपेज्जलौका च सा योज्या रक्तमोक्षणे८७ पुरानी जोंकोंको लेकर एक तांबेके पात्रमें रक्खो उस पात्रमें चार मासे हलदीका चूर्ण और आठ पल जल डाल देवे इस पानीमें डॉली हुई जोंकोंके मुखसे लार बहने लगती हैं । जब लारें निकल चुकें तो इन जोंकोंको साफकर रक्त निकालनेके लिये लगाना चाहिये ( विशेष वर्णन सुश्रुतसंहिताके तेरहवें अध्यायमें देखो ) ॥ ८६ ॥ ८७ ॥ त्याज्य जलौका । रोमपृष्ठा च कपिला रक्तरेखा च दुर्बला । वर्जनीया विशेषेण भिषजा कीर्तिमिच्छता ॥ ८८ ॥ यशकी इच्छावाले वैद्यको चाहिये कि रोमोंवाली जोंकें, कपिल वर्णकी जोंकें, लाल लाल रेखावाली जोंकें और दुर्बल या रोगयुक्त, विषैली जोंकें कभी न लगावे ॥ ८८ ॥ इति जलौकाविधि ॥ विधायरेके बीजोंका शोधन । बीजमादौ समादाय रौद्रयन्त्रे विशोषयेत् । ईषत्सैन्धवयुक्तेन द्रवेण यत्नतः सुधीः ॥ अपामार्गस्य वा तौयैर्वाद्धक्यबीजशोधनम् ॥ ८९ ॥ विधायरेके बीज लेकर उनमें सेंधानमकका थोड़ासा पानी डाल मिट्टीके कपालमें अग्निपर मंद अग्निसे पकावे, पानी सूखनेपर बीजोंको उतार ले यह शुद्ध जानने । अथवा अपामार्गके क्वाथमें पकानेसे भी विधायरेके बीज शुद्ध होजाते हैं ॥ ८९ ॥

भाषाटीकासहित । (९९) वृद्धदारकबीजन्तु पक्वं दोलाकृतं पचेत् । दुग्धपूर्णेषु पत्रेषु ततः शुद्धयति निश्चितम् ॥ ३९० ॥ अथवा विधायरेके बीजोंको पोटलीमें बांध दूधसे भरे मिट्टीके पात्रमें लटका दोलायन्त्रकी विधिसे पकावे तो एक प्रहरमें विधायरेके बीज शुद्ध होजाते हैं ॥ ३९० ॥ अन्य बीजोंके शोधन । अपामार्गकषायेण निम्बुबीजं विशोधयेत् । शिग्रुकार्पासबीजानि अपामार्गस्य बीजकम् ॥ ९१ ॥ घर्मेण शोधनं तेषां न दद्यात्सैन्धवं ततः । तिक्ता कोषातकी दन्ती पटोली चेन्द्रवारुणी । कटुतुम्बी देवदाली काकतुण्डी च शोधयेत् ॥९२॥ अपामार्गके क्वाथमें स्वेदन करनेसे नींबूके बीज शुद्ध होजाते हैं । सुहाजनेके बीज, कपासके बीज और अपामार्गके बीज इनको प्रातःकाल लेकर धूपमें सुखाना ही इनका शोधन है । इनमें नमकका पानी डालकर शोधन करनेकी आवश्यकता नहीं । कुटकी, कड़वी तोरी, दन्ती (जमालगोटेकी जड़), पटोलकी जड़, इन्द्रायण, कड़वी तुम्बी, देवदाली (बंदालडोडा) और काकतुण्डी इनको धूपमें सुखानेसे ही शुद्ध जानना अर्थात् इनको उचित ऋतुमें प्रातःकाल लाकर धूपमें सुखाकर रक्खे जिस योगमें डालना हो डालकर प्रयोग करे ॥ ९१ ॥ ९२ ॥ धात्रीफलरसेनैव महाकालस्य शोधनम् । करञ्जयुग्मयोर्बीजं भृंगराजेन शोधयेत् ॥ ९३ ॥ महाकाल (कालादाना) आमलोंके रसकी भावना देनेसे शुद्ध होजाता है । दोनों प्रकारके करंजुएके बीजोंकी गिरीको भांगरेके रसमें भावना देनेसे करंजबीज शुद्ध होजाते हैं ॥ ९३ ॥

( १०० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । गुञ्जादिबीजशोधन । गुञ्जादिसर्वबीजानां नरमूत्रैः पटुं विना । नारिकेलाम्बुना शोध्यं बिल्वं भल्लातकोद्भवम् ॥९४॥ रत्तक आदि विषैले बीज नमकके बिना ही मनुष्यके मूत्रमें भावना देनेसे शुद्ध होजाते हैं। नारिकेलके जलमें बेलके बीज और भिलावेके बीजोंको शोधन करना चाहिये ॥ ९४ ॥ गुग्गुलशोधन । गुडूचीत्रिफलाक्वाथे क्षीरे चैव विशेषतः । पक्त्वा च खण्डशः शुद्धं गृह्णीयान्मृदुगुग्गुलुम् ३९५॥ इति श्रीगोपालकृष्णसूरिविरचिते रसेन्द्रसारसंग्रहे पूर्वखण्डः समाप्तः । उत्तम नवीन गुग्गुलके छोटे २ टुकड़े कर गिलोयके क्वाथमें, त्रिफलेके क्वाथमें और गोदुग्धमें पकानेसे गुग्गुल शुद्ध होजाती है । ( प्रथम गुग्गुलको टुकड़े २ कर गिलोय या त्रिफलेके क्वाथमें भिगोदे, दूसरे दिन उबाल ले जब क्वाथमें गूगल घुल जावे तो वस्त्रमें छान ले बाकी रहे गूगलको फिर क्वाथमें पकाकर छान ले, कंकड़ तिनका आदि दूर फेंककर कड़ाहीमें क्वाथको खोयेके समान गाढ़ा कर पिण्डसा बननेपर गुग्गुलको शुद्ध जाने यह गुग्गुल सब औषधि- प्रयोगमें काम लेवे ) ॥ ३९५ ॥ इति गुग्गुल शोधन ॥ दोहा-रस धातु मणि आदिको, शोधन मारण भेद ॥ इहि विधि जानहिं जे भिषक्, हरहिं जगत्को खेद ॥ होहिं चतुर रसकर्ममें, पढ भाषा अनुवाद ॥ प्रथम खण्ड पूरित भयो,तिलकित रामप्रसाद ॥ इति श्रीपटियालाराज्यस्थवैद्यरत्न रामप्रसादराजवैद्यवैद्योपाध्यायकृत- भाषाटीकायां पूर्वखण्डः समाप्तः ।

अथोत्तरखण्डः । क्षीराब्धेरुत्थितं देवं पीतवस्त्रं चतुर्भुजम् । वन्दे धन्वन्तरिं भक्त्या नानागदनिषूदनम् ॥ १ ॥ जो क्षीर समुद्रके मथनेके समय पीत वस्त्रोंको धारण किये हुए चतुर्भुज भगवान् प्रगट हुए और जो नाना रोगोंके नाश करनेवाले देव हैं उन धन्वन्तरि भगवान्‌को मैं भक्तिपूर्वक प्रणाम करता हूं ॥ १ ॥ प्रायशो वपुषः शुद्धिं कृत्वा देयं तदौषधम् । अतः पूर्वं चिकित्सायां रेचकौषधमुच्यते ॥ २ ॥ प्रायः संपूर्ण रोगोंमें शरीरको शुद्ध करके तदनंतर औषधि देना चाहिये । इसलिये संपूर्ण औषधियोंसे पहले रेचनी औषधियोंको कथन करते हैं ॥ २ ॥ इच्छाभेदी रस । तुल्यं टङ्कणपारदं समरिचं तुल्यांशकं गन्धकं विश्वा च द्विगुणा ततो नवगुणं जैपालचूर्णं क्षिपेत् । गुञ्जैकप्रमितो रसो हिमजलैः संसेवितो रेचयेत् यावन्नोष्णजलं पिबेदपि वरं पथ्यञ्च दध्योदनम्॥३॥ शुद्ध सुहागा, शुद्ध पारा, कालीमिर्च और शुद्ध गंधक यह सब एक एक भाग लेवे । सोंठ दो भाग, शुद्ध जमालमोटा ९ भाग इन सबको खरल करके शीशीमें रक्खे इसमेंसे एक रत्ती प्रमाण प्रातःकाल खाकर ऊपरसे शीतल जल पीवे तो उत्तम रीतिसे रेचन ( दस्त ) होजाता है । जबतक गरम जल न पीवे तबतक रेचन होता रहता है । ठीक रेचन हो लेनेके अनंतर दहीभातका पथ्य खिलावे ॥ ३ ॥