रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
पृष्ठ 113, कुल 584 में से
संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ८७ ) दिवा वा यदि वा रात्रौ विधिनानेन पाचकः । चतुर्भिः प्रहरैरेवं पुटपाकेन मारयेत् ॥ ४६ ॥ एक हाथका गहरा, चौड़ा, गोल गढ़ा खोदे; उसमें आधे भाग- तक एरने उपले अथवा तुष और काष्ठ भर दे फिर लोहेके चूर्णका संपुट रख अग्नि गेरे और ऊपरले आधे भागको भी पूर्ववत् उपलोंसे या काष्ठादिसे भर दे । इसप्रकार रात्रिको अथवा दिनमें पुट देवे, चार प्रहरतक इसी तरह रहने दे फिर स्वांग शीतल होनेपर निकाल ले । ( संपुट खोलकर बीचमेंसे लोह निकाल जिस द्रव्यकी पुट देनी हो उसके रसमें रगड़कर सुखा ले फिर इसी प्रकार पुट दे ) ॥४५॥४६॥ पुटमें दोष । पुटपाके क्षणादूर्ध्वं स्थितो भवति भस्मसात् । अधस्तादपकृष्टस्तु मन्दो भवति वीर्यतः ॥ ४७ ॥ कुण्डस्थो भस्मनाच्छन्न आक्रष्टव्यः सुशीतलः । समाकृष्टस्य तप्तस्य गुणहानिः प्रजायते ॥ ४८ ॥ यदि पुटको पहले ही भरकर ऊपर संपुट रक्खे तो संपुटमें जो द्रव्य हो उसकी शीघ्र ही निस्सारभस्म होजाती है ( या द्रव्य उड़ जाता है ) और पुटमें नीचे ही संपुटको रख देनेसे मन्द वीर्य हो जाता है इसलिये संपुटको पुटके मध्यमें रखना चाहिये । जब पुट स्वांग शीतल होजाये तो निकाल ले गरमको न निकाले, गरम निकालनेसे गुण नष्ट होजाता है ॥ ४७ ॥ ४८ ॥ अन्य प्रकारसे लोह मारण । शुद्धस्य सूतराजस्य भागो भागद्वयं बलेः । द्वयोः समं लोहचूर्णं मर्दयेत्कन्यकाद्रवैः ॥ ४९ ॥ यामद्वयं ततो गोलं स्थापयेत्ताम्रभाजने । आच्छाद्यैरण्डजैः पत्रैरुष्णो यामद्वयाद्भवेत्॥३५०॥