रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ८६ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । गण वाजीकरणमें श्रेष्ठ है । ( यदि नपुंसकता दूर करने या कामशक्ति बढ़ानेको लोह भस्म करना हो तो इस गणसे पुटें दे ) ॥ ४१ ॥ विदारीकंदादि गण। विदारीकन्दपिण्डाह्वभृङ्गराजशतावरी । क्षीरकञ्चुकभल्लातामृतकाचित्रकैस्तथा ॥ ४२ ॥ करिकर्णपलाशैश्च मूसलीमधुकैरपि । मुण्डिरीकेशराजैश्च पुटो देयो रसायने ॥ ४३ ॥ विदारीकंद, पिण्डाह्व ( शिलारस ), आंगरा, शतावरी, क्षीरकञ्चुकी, भिलावे, गिलोय, चित्रक, बड़ेपत्रका ढाक, मुसली, मुलैठी, गोरख- मुण्डी और केशराज इसको विदारीकंदादि गण कहते हैं । रसायनार्थ इन द्रव्योंसे पुट देना चाहिये ॥ ४२ ॥ ४३ ॥ सामान्ये च विशेषे च पुटे यद्यत्प्रकीर्तितम् । मिलितैरेकशो वा तैर्यथेष्टं पुटयेत्ततः । पुटपाके फलादीनामयसा ग्रहणं समम् ॥ ४४ ॥ ऊपर कहे सामान्य (त्रिफलादि) गणकी या विशेष एरण्डादि गणकी जिस जिसकी पुट देनी हो उस गणकी सब औषधियोंको इकट्ठाकर वा अलग अलग लेकर जैसा उचित हो वैसे द्रव्योंका स्वरस या काथ लोहचूर्णके बराबर डालकर खरल कर सुखाले,फिर संपुटमें रख कपड- मिट्टीसे संधान कर पुटमें फूंक दे,पुटपाकमें त्रिफलादि जो द्रव्य मिलाने हों लोहचूर्णके समान मिलाने चाहिये ॥ ४४ ॥ पुटपाकविधान । हस्तमात्रमिते गर्ते करीषेणार्द्धपूरिते । अथवा तुषकाष्ठाभ्यां पूरितेऽर्द्धे निधापयेत् ॥ ४५ ॥ लोहमग्निं ततो दत्त्वा तथैवोर्द्धं प्रपूरयेत् ।