भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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( ८८ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । त्रिरात्रं धान्यराशिस्थं तत्ततो मर्दयेद्दृढम् । रजस्तद्वस्त्रगलितं नीरे तरति हंसवत् ॥ तीक्ष्णं मुण्डं कान्तलोहं निरुत्थं जायते मृतम्॥५१॥ शुद्ध पारा एक भाग, शुद्ध आमलासार गंधक दो भाग इन दोनोंके बराबर उपरोक्त विधिसे शुद्ध किया लोह चूर्ण ले, पहिले पारे गंधकको रगड़कर कजली करे फिर इसमें लोहचूर्ण मिला घीकुमारके रसमें दो पहर रगड़कर गोला बनावे इस गोलेको तांबेके पात्रमें रख दो पहरकी अग्नि देवे ( इस पात्रको चूल्हेपर चढ़ा कर नीचे दो पहर तीक्ष्ण अग्नि जलावे । कोई इसको पुटमें फूंकना मानते हैं परन्तु मूलपाठसे पुटमें फूंकनेका अर्थ नहीं निकलता, कोई कोई पुरुष तीक्ष्ण धूपमें दो पहर रखना ऐसा अर्थ करते हैं, हमारी रायमें दो पहरकी अग्नि देना ठीक है अथवा दो पहर घीकुमारमें रगड़कर पुट देना भी ठीक है ) फिर शीतल होनेपर पात्रमेंसे लोहचूर्णके गोलेको निकाल एरंडके पत्रोंसे लपेट धान्योंकी राशिमें तीन दिन पर्यन्त दबाये रक्खे चौथे दिन निकालकर खरलमें डाल बारीक चूर्ण करे और वस्त्रद्वारा छानकर पानीपर तैरावे ( जबतक पानीपर तैरनेवाली उत्तम भस्म न बने तब- तक इसी विधानसे पारे गंधकके संयोगसे गोला बनाकर दो प्रहरकी अग्नि या पुट दे धान्यके ढेरमें दबाकर चूर्ण करता रहे, जब हंसके समान तैरनेवाली होजाय तो शुद्ध भस्म जाने ) इस प्रकार तीक्ष्णलोह वा मुण्डलोह, या कांतलोह इनमेंसे कोई भी लोह हो उसकी उत्तम निरुत्थ भस्म होजाती है ॥ ४९-५१ ॥ द्वादशांशेन दरदं तीक्ष्णचूर्णस्य मेलयेत् । कन्यानीरेण संमर्द्य यामयुग्मञ्च संपुटेत् । एवं सप्तपुटे मृत्युं लोहचूर्णमवाप्नुयात् ॥ ५२ ॥ अन्य प्रकार—शुद्ध लोहचूर्णमें बारहवां भाग सिंगरफ मिलाकर दो पहर तक घीकुमारके रसमें खूब रगड़े फिर संपुटमें रख पुटमें फूंक दे इसप्रकार सात पुटें देनेसे लोहेकी उत्तम भस्म होजाती है ॥ ५२ ॥

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