रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ८९ ) निरुत्थ भस्मकी परीक्षा । सर्वमेतन्मृतं लोहं पक्तव्यं मित्रपञ्चकैः । यद्येवं स्यान्निरुत्थञ्च सेव्यं रक्तिचतुष्टयम् ॥ ५३ ॥ सब प्रकारके मृत लोहोंको मित्रपंचकमें मिलाकर कोयलोंकी अग्निमें तपावे यदि इस प्रकार तीक्ष्णाग्नि देनेसे भस्म जैसी डाली थी वैसाही रहे तो निरुत्थ भस्म जाने, निरुत्थ भस्म हो तो इसको चार रत्ती मात्रा तक सेवन कर सकते हैं (यदि वही धातु जी जावे तो उसे न खावे फिर पूर्ववत् पुटें देवे जब निरुत्थ हो जाये तो सेवन करे) ५३॥ मित्रपंचक । मधु सर्पिस्तथा गुञ्जा टंकणं गुग्गुलुस्तथा । मित्रपञ्चकमेतच्च गदितं धातुमेलने ॥ ५४ ॥ शहद, घी, रत्तकें, सुहागा और गुग्गुल इन पांच द्रव्योंको मित्रपञ्चक कहते हैं, इस मित्रपञ्चकमें मिलाकर धमानेसे जो धातु फूंकनेमें कच्ची रहगई हो वह जी उठती है अर्थात् फिर वैसी ही बन जाती है ॥ ५४ ॥ अन्य प्रकारसे परीक्षा । गोघृतं गन्धकं लोहं तप्तखल्ले विमर्दयेत् । दिनैकं कन्यकाद्रावै रुद्ध्वा गजपुटे पचेत् ॥ इत्येवं सर्वलोहानां कर्त्तव्यं स्यान्निरुत्थितम् ॥५५॥ गोघृत, गंधक और लोहभस्म इनको घीकुमारके रससे तप्त खल्वमें एक दिन मर्दन कर संपुटमें रख गजपुटमें फूंक दे । शीतल होनेपर निकाले यदि निरुत्थ भस्म हो तो सेवन करे । इस प्रकार सब प्रकारके लोहोंकी परीक्षा करनी चाहिये ॥ ५५ ॥ घृतमधुगुञ्जाटंकणैःसमं लोहभस्म मर्दयेच्च विचक्षणः। धमेद्बह्नौ पुनर्लोहं तदा योज्यं रसायने ॥ ५६ ॥