रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
पृष्ठ 116, कुल 584 में से
संदर्भ में पढ़ें( ९० ) रसेन्द्रसारसंग्रह । अन्य मत—घी, शहद, रत्तकें और सुहागा इनकी बराबर लोहभस्म डालकर मर्दन करे फिर मूषामें या संपुटमें रख कोयलोंकी अग्निमें धौंकनीसे धमावे यदि भस्म निरुत्थ रहे तो रसायनकर्ममें आयुवृद्धिके लिये प्रयोग करे ॥ ५६ ॥ लोहभस्मके गुण । कृष्णायःशोथशूलार्शःक्रिमिपाण्डुत्वशोषनुत् । वयस्यं गुरु चक्षुष्यं सर्वमेदोऽनिलापहम् ॥५७॥ आयुःप्रदाता बलवीर्यकर्त्ता रोगापहर्त्ता मदनस्य कर्त्ता । अयःसमानं नहि किञ्चिदस्ति रसायनं श्रेष्ठतमं नराणाम् ॥ ५८ ॥ लोहभस्म-सूजन, शूल, अर्श, क्रिमिरोग, पाण्डुरोग और शोष रोगको नष्ट करनेवाली है तथा अवस्थास्थापक, भारी, नेत्रोंको हितकारी, सब प्रकारके मेदरोग और वातरोगोंको दूर करती है । एवं आयुको देनेवाली, बलकारक, वीर्यवर्द्धक, रोगनाशक और कामशक्तिवर्द्धक है, मनुष्योंके लिये लोहभस्मके समान और कोई भी रसायन उत्तम नहीं है ॥ ५७ ॥ ५८ ॥ लोहसेवनमें कुपथ्य । कूष्माण्डं तिलतैलञ्च रसोनं राजिकां तथा । मद्यमम्लरसञ्चैव त्यजेल्लोहस्य सेवकः ॥ ५९ ॥ पेठा, तिलतेल, लहसुन, राई, मद्य और खट्टे रसवाले पदार्थ इन सबको लोहभस्मको खानेवाला मनुष्य त्याग देवे ॥ ५९ ॥ जातिभेदसे लोहके गुणोंमें न्यूनाधिकता । सामान्याद्विगुणं क्रौञ्चं कालिङ्गोऽष्टगुणस्ततः । कलेः शतगुणं भद्रं भद्राद्वज्रं सहस्रधा ॥ ३६० ॥