रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)
Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary
गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभाषाटीकासहित । ( ९१ ) वज्राच्छतगुणं पाण्डि निरङ्गं दशभिर्गुणैः । ततः कोटिसहस्रैर्वा कान्तलोहं महागुणम् ॥ ६१ ॥ सामान्य लोहसे क्रौञ्चलोह गुणमें दोगुणा अधिक गुणकारी है । क्रौंचसे कालिंगलोह आठगुणा गुण करता है । कालिंगेसे भद्रलोह सौगुणा गुणकारी है । भद्रसे वज्रलोह सहस्रगुणा, वज्रसे पाण्ड्य लोह सौगुणा गुणमें अधिक है. एवं पाण्ड्य लोहसे दशगुणा निरंग और निरंगसे भी सहस्रों करोडों गुणा अधिक गुणकारी कांतलोह होता है इसलिये कांतलोह सब लोहोंमें महागुणकारी होता है ॥३६०॥६१॥ इति लोह मारण । मण्डूर शोधन । ये गुणा मारिते मुण्डे ते गुणा मुण्डकिट्टेके । तस्मात्सर्वत्र मण्डूरं रोगशान्त्यै प्रयोजयेत् ॥ ६२ ॥ जो गुण मारे हुए लोहमें होते हैं वही गुण लोहकिट्टमें भी होते हैं। इसलिये लोहभस्मके अभावमें लोहकिट्ट ( मण्डूरकी ) भस्मका संपूर्ण रोगोंकी शांतिके लिये प्रयोग करना चाहिये ॥ ६२ ॥ मण्डूरके गुण । शतोर्ध्वमुत्तमं किट्टं मध्यञ्चाशीतिवार्षिकम् । अधमं षष्टिवर्षीयं ततो हीनं विषोपमम् ॥ ६३ ॥ यदि १०० सौ वर्षका पुराना मण्डूर हो तो गुणमें उत्तम होता है । ८० अस्सी वर्षका पुराना मण्डूर मध्यम होता है और साठ ६० वर्षका पुराना अधम होता है, यदि साठ वर्षसे कम पुराना मण्डूर हो तो वह विषके समान जानना, इसलिये अत्यंत पुराना मण्डूर लेकर मारना चाहिये ॥ ६३ ॥