भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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( ९२ ) रसेन्द्रसारसंग्रह । मण्डूर मारण । दग्ध्वाक्षकाष्ठैर्मलमायसन्तु गोमूत्रनिर्वापितमष्ट- वारान् । विचूर्ण्य लीढं मधुना चिरेण कुम्भाह्वयं पाण्डुगदं निहन्ति ॥ ६४ ॥ लोहकिट्टको बहेड़ेकी लकड़ियोंकी अग्निमें तपा २ कर गोमूत्रमें बुझावे, इस प्रकार आठ वार बुझानेसे मण्डूर मर जाता है, इसको पीसकर शहदके साथ चाटनेसे कुम्भकामला और पाण्डुरोग दूर होते हैं ॥ ६४॥ गुणाधिक्य । किट्टाद्दशगुणं मुण्डं मुण्डात्तीक्ष्णं शताधिकम् । तीक्ष्णाल्लक्षगुणं कान्तं भक्षणात्कुरुते गुणम् ॥ ६५ ॥ मण्डूरसे मुण्डूरलोहभस्म दशगुणा गुण करती है । मुण्डलोहसे तीक्ष्ण लोहभस्म सौगुणा अधिक गुण करती है। एवं कांतभस्मके खानेसे तीक्ष्ण लोहभस्मसे लक्षगुणा अधिक गुण होता है ॥ ६५ ॥ इति किट्ट शोधनविधि । सुवर्णादि धातुओंके साधारण मारक द्रव्य । नागैः सुवर्णं रजतञ्च ताप्यैर्गन्धेन ताम्रं शिलया च नागम् । तालेन वङ्गं त्रिविधञ्च लोहं नारीपयो हन्ति च हिङ्गुलेन ॥ ६६ ॥ नाग ( सिक्का ) के संयोगसे पुटें देनेसे सुवर्णकी भस्म होजाती है । सोनामाक्खीसे चांदीकी भस्म होजाती है । गंधकके संग पुटें देनेसे ताम्बेकी भस्म होजाती है । मनसिलके साथ पुटें देनेसे सिक्केकी भस्म होजाती है, एवं हरितालसे वंगकी भस्म होजाती है और सिंगरफ तथा स्त्रीका दूध मिलाकर पुटें देनेसे सब प्रकारके लोहोंकी भस्म होजाती है । ( इन द्रव्योंमें रगड़ रगड़ कर पुटोंमें फूंकनेसे भस्म होजाती है ) ॥ ६६ ॥ इति स्वर्णादि धातु शोधन मारण ।