भारतकोश
रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

रसेन्द्रसारसंग्रह (गोपालकृष्ण - पं. रामप्रसाद वैद्य सविस्तार सान्वय हिन्दी टीका सहित)

Rasendra Sara Sangraha of Gopalakrishna with Commentary

गोपालकृष्ण भट्ट (टीकाकार: पं. रामप्रसाद वैद्य) द्वारा

DevanagariHindipublished584 पृष्ठ

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भाषाटीकासहित । ( ९३ ) मणियुक्तादिरत्नशोधन मारण । स्वेदयेद्दोलिकायन्त्रे जयन्त्याः स्वरसेन च । मणिमुक्ताप्रवालानि यामैकेन च शोधयेत् ॥ ६७ ॥ मणियाँ, मोती और मूंगे इनमेंसे जिसको शुद्ध करना हो उसे वस्त्रमें पोटली बांधकर जयंतीके स्वरसमें एक प्रहर दोलायंत्रकी विधिसे पकावे तो मणि, मुक्ता और प्रवाल शुद्ध होजाते हैं ॥ ६७ ॥ मोतियोंका मारण । मुक्ताफलानि शुद्धानि खल्ले पिष्ट्वा पुटेल्लघु । एवं भस्मत्वमाप्नोति वज्रकं काञ्जियोगतः ॥ ६८ ॥ शुद्ध मोती लेकर खरलमें पीसकर लघुपुटमें फूंक दे तो मोतियोंकी भस्म होजाती है । यदि वज्रकी भस्म करनी हो तो कांजीके संयोगसे करे अर्थात् वज्रको शुद्ध करके तपा तपा कर कांजीमें बुझावे, फिर कांजीमें पीसकर पुट देनेसे वज्र ( हीरा ) की भस्म होजाती है ॥६८॥ अन्य प्रकारसे रत्नमारण । कुमार्या तण्डुलीयेन तुल्येन च निषेचयेत् । प्रत्येकं सप्तवारांश्च तप्ततप्तानि कृत्स्नशः ॥ ६९ ॥ मौक्तिकानि प्रवालानि तथा रत्नान्यशेषतः । क्षणाद्विविधवर्णानि म्रियन्ते नात्र संशयः ॥३७०॥ मोती, मूंगा या अन्य सब प्रकारके रत्न तीक्ष्णाग्निमें तपा २ कर समभाग घीकुवारके रस तथा चौलाईके रसमें सात २ बार बुझानेसे अवश्य मर जाते हैं । ( जिस रत्नकी भस्म करनी हो उसको अग्निमें लाल कर बराबरके घीकुवारके रससे बुझावे, ऐसे सात बार घीकुवारके रससे और सात बार चौलाईके रससे बुझावे तो मोती आदि सब रत्नोंकी भस्म होजाती है ) ॥ ६९ ॥ ३७० ॥